भारत के वे संस्थान जहाँ आरक्षण लागू नहीं है: OBC, SC, ST प्रतिनिधित्व पर विशेष रिपोर्ट
भारत के वे संस्थान जहाँ आरक्षण लागू नहीं है: OBC, SC, ST प्रतिनिधित्व पर विशेष रिपोर्ट
भारत में सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 330 और 332 के तहत शिक्षा, सरकारी नौकरियों और विधायी निकायों में SC, ST और OBC वर्गों को आरक्षण दिया गया है। लेकिन सत्ता और निर्णय-निर्माण के कई महत्वपूर्ण केंद्र — न्यायपालिका से लेकर लेटरल एंट्री और निजी क्षेत्र तक — ऐसे हैं जहाँ यह संवैधानिक सुरक्षा कवच लागू ही नहीं होता। इन संस्थानों में वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है, इसकी पड़ताल यह रिपोर्ट करती है।
भाग 1: वे संस्थान जहाँ आरक्षण लागू नहीं है
1. न्यायपालिका — हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज
संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली से होती है, जिसमें किसी भी जाति या वर्ग के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है — यह बात खुद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में स्पष्ट की है।
2. लेटरल एंट्री (सिविल सेवा में सीधी भर्ती)
केंद्र सरकार ने राज्यसभा में स्पष्ट किया कि संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर की लेटरल एंट्री भर्तियों में आरक्षण नहीं दिया जाता, क्योंकि यह भर्ती "विशेषज्ञता" के आधार पर होती है, सामान्य प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की तरह नहीं।
3. सशस्त्र बल (सेना के अधिकारी रैंक)
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में SC, ST और OBC के लिए सीटों के आरक्षण की मांग वाली याचिका पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि सामाजिक क्रांति रातोंरात नहीं होती और सेना को जाति के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता।
4. पदोन्नति में आरक्षण (सीमित दायरा)
संवैधानिक प्रावधानों के तहत सामान्यतः पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जाता, हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों (पिछड़ेपन के मात्रात्मक आंकड़े, प्रशासनिक दक्षता) के पालन पर राज्यों को पदोन्नति-आरक्षण की छूट दी है — यानी यह एक अपवाद-आधारित, वैकल्पिक व्यवस्था है, स्वतः लागू अधिकार नहीं।
5. निजी क्षेत्र
निजी कंपनियों, कॉरपोरेट बोर्ड और अधिकांश निजी शिक्षण संस्थानों (कुछ अल्पसंख्यक/निजी सहायता-प्राप्त संस्थानों को छोड़कर) में कोई कानूनी आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं है।
भाग 2: प्रतिनिधित्व के आंकड़े — संस्थान-दर-संस्थान
हाईकोर्ट जज (2018–2023 के आंकड़े, कानून मंत्रालय)
इस अवधि में नियुक्त कुल 650 हाईकोर्ट जजों में से 492 जज (75.69%) सामान्य श्रेणी से थे। शेष में से 23 जज अनुसूचित जाति (SC), 10 अनुसूचित जनजाति (ST), 76 अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और 36 धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से थे — यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक वर्गों का संयुक्त प्रतिनिधित्व लगभग 22.24% ही रहा (SC 3.54%, ST 1.54%, OBC 11.7%, अल्पसंख्यक 5.54%)।
एक अन्य विश्लेषण के अनुसार देश के उच्च न्यायालयों में करीब 78% जज सवर्ण जाति से हैं, जबकि OBC से लगभग 12% और SC-ST-अल्पसंख्यक मिलाकर केवल 5% ही न्यायाधीश बनाए गए हैं।
निचली अदालतें (जिला व अधीनस्थ न्यायपालिका)
यहाँ स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है क्योंकि भर्ती परीक्षा-आधारित है और राज्य-स्तरीय आरक्षण नियम लागू होते हैं। देशभर की जिला और अधीनस्थ अदालतों में कार्यरत जजों में से लगभग 46% आरक्षित श्रेणियों से आते हैं।
केंद्रीय विश्वविद्यालय — शिक्षक पद (प्रोफेसर स्तर)
यह सबसे चिंताजनक आंकड़ा है। सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर-स्तर पर OBC वर्ग के लिए कुल 313 पद आरक्षित थे, लेकिन उनमें से केवल नौ पद ही भरे जा सके — यानी 97% से अधिक आरक्षित पद खाली रह गए।
उसी रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल 6,688 शिक्षण पद रिक्त पाए गए, जिनमें से 1,084 पद SC के लिए, 604 पद ST के लिए और 1,684 पद OBC के लिए आरक्षित थे — कुल मिलाकर आरक्षित वर्ग की करीब आधी रिक्तियाँ इसी में समाई हुई थीं।
एक संसदीय आंकड़े के अनुसार, जनवरी 2021 तक देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के कुल 18,408 पद स्वीकृत थे, जिनमें से 10,236 पद अनारक्षित वर्ग के लिए थे और शेष विभिन्न आरक्षित श्रेणियों के लिए, पर बड़ी संख्या में ये पद भरे नहीं गए।
सिविल सेवा (अखिल भारतीय सेवाएं — IAS/IPS आदि)
पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, अखिल भारतीय सेवाओं की नियुक्तियों में OBC, SC और ST का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15.92%, 7.65% और 3.80% रहा है, जबकि इन समुदायों की आबादी में हिस्सेदारी लगभग आधी है — यानी जनसंख्या अनुपात की तुलना में प्रतिनिधित्व काफी कम है।
पुलिस बल (राज्यवार)
India Justice Report 2025 (जनवरी 2023 के आंकड़ों पर आधारित) के अनुसार, केवल पाँच राज्यों — गुजरात, मणिपुर, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और गोवा — ने ही अधिकारी स्तर पर SC आरक्षण कोटा पूरा किया, जबकि अधिकांश राज्यों में विशेष रूप से अधिकारी स्तर पर SC प्रतिनिधित्व तय कोटे से कम पाया गया।
लेटरल एंट्री (केंद्र सरकार में सीधी भर्ती, 2018 से अब तक)
2018 से अब तक लेटरल एंट्री के जरिए कुल 63 नियुक्तियाँ हुई हैं, जिनमें से 35 नियुक्तियाँ निजी क्षेत्र से आई हैं। पहले चरण (2018-19) में संयुक्त सचिव के 10 पदों के लिए भर्ती की योजना बनी थी, लेकिन सितंबर 2019 तक केवल 8 नियुक्तियाँ हो पाईं, जिनमें से 7 अभी भी कार्यरत हैं। चूंकि इन नियुक्तियों में आरक्षण लागू नहीं होता, इसलिए इनमें OBC, SC, ST वर्गों का औपचारिक प्रतिनिधित्व दर्ज ही नहीं किया जाता — यही इस प्रणाली पर विपक्ष की मुख्य आपत्ति भी रही है।
केंद्र सरकार के मंत्रालय/विभाग — कुल रिक्तियाँ
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा हर साल 1 जनवरी को जारी आंकड़ों में केंद्र सरकार की सेवाओं में SC, ST, OBC वर्गों के प्रतिनिधित्व का ब्यौरा दिया जाता है, और मंत्रालय स्वयं मानता है कि आरक्षित बैकलॉग रिक्तियों को भरने के लिए विशेष भर्ती अभियान और आंतरिक समितियाँ गठित करने के निर्देश बार-बार जारी करने पड़े हैं — जो यह दर्शाता है कि बैकलॉग एक स्थायी समस्या बनी हुई है।
भाग 3: निष्कर्ष का सार
| संस्थान | आरक्षण की स्थिति | OBC/SC/ST प्रतिनिधित्व |
|---|---|---|
| हाईकोर्ट जज (2018-23) | लागू नहीं | SC 3.54%, ST 1.54%, OBC 11.7% (कुल ~22%) |
| निचली अदालतें | राज्य नियमों से लागू | ~46% आरक्षित वर्ग से |
| केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रोफेसर (OBC) | लागू, पर पद खाली | 313 में सिर्फ 9 पद भरे |
| अखिल भारतीय सेवाएं (5 वर्ष औसत) | लागू | OBC 15.92%, SC 7.65%, ST 3.80% |
| लेटरल एंट्री (2018 से अब तक) | लागू नहीं | कोई आधिकारिक वर्गीकरण दर्ज नहीं |
| NDA/सेना अधिकारी रैंक | लागू नहीं (SC ने खारिज किया) | कोई आरक्षण डेटा नहीं |
| पुलिस अधिकारी स्तर (राज्यवार) | लागू | केवल 5 राज्यों में SC कोटा पूर्ण |
निष्कर्ष
आंकड़े दो तरह की समस्याएं उजागर करते हैं। पहली — न्यायपालिका, लेटरल एंट्री और सशस्त्र बलों जैसे शक्ति-केंद्रों में आरक्षण संवैधानिक रूप से लागू ही नहीं है, इसलिए वहाँ OBC-SC-ST प्रतिनिधित्व पूरी तरह नियुक्ति-प्रणाली और सामाजिक-आर्थिक पहुंच पर निर्भर करता है। दूसरी — जहाँ आरक्षण कानूनन लागू भी है (जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर पद), वहाँ भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाती हैं, जिससे कागज़ पर मौजूद अधिकार व्यवहार में लगभग निष्प्रभावी हो जाता है।
सोर्स / संदर्भ
- LiveLaw Hindi — हाईकोर्ट जज SC/ST/OBC प्रतिनिधित्व (2018-2023, कानून मंत्रालय डाटा) — hindi.livelaw.in
- The Lallantop — 650 हाईकोर्ट जज, SC-ST-OBC-अल्पसंख्यक आंकड़े — thelallantop.com
- Subkuz — निचली अदालतों में आरक्षित वर्ग के जज (~46%) — subkuz.com
- Agniban — उच्च न्यायालयों में 78% सवर्ण जज — agniban.com
- The Print Hindi — केंद्रीय विश्वविद्यालय OBC प्रोफेसर पद (313 में 9 भरे) — hindi.theprint.in
- Sansadnama — केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 18,408 स्वीकृत शिक्षक पद (जनवरी 2021) — sansadnama.com
- Zee News Hindi — लेटरल एंट्री से अब तक 63 नियुक्तियां — zeenews.india.com
- Aaj Tak — लेटरल एंट्री से 8 संयुक्त सचिव नियुक्त (RTI खुलासा) — aajtak.in
- Prabhat Khabar — लेटरल एंट्री में आरक्षण नहीं, केंद्र सरकार का राज्यसभा में स्पष्टीकरण — prabhatkhabar.com
- Newswing — सुप्रीम कोर्ट का NDA में SC/ST/OBC आरक्षण से इनकार — newswing.com
- The Mooknayak — India Justice Report 2025: पुलिस बल में SC/ST/OBC प्रतिनिधित्व — themooknayak.com
- NewsClick Hindi — अखिल भारतीय सेवाओं में OBC/SC/ST प्रतिनिधित्व (5 वर्ष आंकड़े) — hindi.newsclick.in
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