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“छत पर सोलर की नई कहानी: कम बिजली बिल से रोजगार तक बदल रही तस्वीर”


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आंकड़ों की पड़ताल15 सितंबर 2026

“छत पर सोलर की नई कहानी: कम बिजली बिल से रोजगार तक बदल रही तस्वीर”

घर की छत पर सोलर पैनल लगवाने का मतलब अब सिर्फ बिजली का बिल कम करना नहीं रहा। सवाल बदल गया है — क्या यह छत कमाई का जरिया भी बन सकती है, इंस्टॉलेशन और सर्विसिंग के जरिए? और सरकार जो आंकड़े गिना रही है, क्या वे उतने ही सीधे हैं जितने सुनने में लगते हैं?

दावा
यहीं मोड़ आता है — योजना की रफ्तार पर अलग-अलग समय पर बिल्कुल अलग तस्वीरें मिलती हैं। जनवरी 2025 में, योजना के एक साल पूरे होने पर, बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट ने बताया कि तब तक सिर्फ 8.46% लक्ष्य हासिल हुआ था, औसत इंस्टॉलेशन दर 70,000 प्रति माह। इसी रफ्तार पर चला जाए तो जनवरी 2027 तक सिर्फ 26.89% लक्ष्य पूरा होगा — रिपोर्ट ने इसे योजना के सामने "पहाड़" बताया था। फरवरी 2026 में एंजल वन की खबर ने वजह जोड़ी: ऋण अस्वीकृतियां और DISCOMs का सीमित सहयोग रफ्तार पर भार डाल रहे थे।
तथ्य
लेकिन जुलाई 2026 आते-आते तस्वीर बदल गई। pv magazine के मुताबिक योजना हर छह दिन में करीब एक लाख घर जोड़ रही थी। अक्टूबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच रोजाना इंस्टॉलेशन की रफ्तार 3.2 गुना बढ़ी — 5,038 प्रति दिन से करीब 16,328 प्रति दिन। जुलाई 2026 अकेला अब तक का सबसे तेज महीना रहा, 5.06 लाख घरों के साथ। इसका मतलब यह नहीं कि पहले की आलोचना गलत थी — बस योजना धीमी शुरुआत के बाद तेज हुई, और दोनों बातें एक साथ सच हैं।

31 अगस्त 2026 तक देश में ग्रिड से जुड़े रूफटॉप सोलर की कुल क्षमता 32.59 GW थी — भारत की कुल सौर क्षमता 168.04 GW का करीब पांचवां हिस्सा। यह संख्या अचानक नहीं बनी। 2018 के आखिर में यह सिर्फ 3.4 GW थी। फरवरी 2022 तक, यानी चार साल में, यह दोगुनी भी नहीं हुई — सिर्फ 6.48 GW तक पहुंची। मार्च 2024 तक 11.87 GW, और अगले ढाई साल में तीन गुने से ज्यादा उछलकर 32.59 GW। यह उछाल एक ही वजह से जुड़ा है — फरवरी 2024 में शुरू हुई PM-Surya Ghar Muft Bijli Yojana।

पहली कोशिश नाकाम रही थी

याद रखने लायक बात यह है कि यह भारत की पहली रूफटॉप सोलर योजना नहीं है। 2014 में शुरू हुए ग्रिड-कनेक्टेड रूफटॉप प्रोग्राम का लक्ष्य 2022 तक 40 GW था। लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, समयसीमा 2026 तक बढ़ानी पड़ी। फरवरी 2022 तक हासिल क्षमता सिर्फ 6.48 GW थी — तय लक्ष्य के छठे हिस्से से भी कम। Drishti IAS के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में जनवरी-सितंबर के बीच सिर्फ 1,165 मेगावाट इंस्टॉल हुए, 2021 की इसी अवधि के 1,310 मेगावाट से भी कम। रफ्तार बढ़ने की जगह घट रही थी।

यही पृष्ठभूमि है जिसके बाद फरवरी 2024 में मौजूदा योजना आई — नई सब्सिडी संरचना, सीधे बैंक खाते में भुगतान। पुरानी योजना को 6.48 GW तक पहुंचने में आठ साल लगे, नई योजना ने ढाई साल में इसे पांच गुने से ज्यादा बढ़ाकर 32.59 GW कर दिया।

योजना का ढांचा

कुल वित्तीय प्रावधान ₹75,021 करोड़ है, लक्ष्य है मार्च 2027 तक 1 करोड़ घरों की छत पर सोलर। इसमें ₹65,700 करोड़ सिर्फ आवासीय उपभोक्ताओं की केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) के लिए तय हैं। हिसाब सीधा है — 2 kW तक की क्षमता पर लागत का 60% सरकार देती है, अगले 1 kW पर 40%। यानी अधिकतम ₹78,000 सीधे बैंक खाते में, बशर्ते पैनल ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) में सूचीबद्ध वेंडर से लगे हों — किसी दुकान पर 60% छूट जैसा, बाकी दाम आपको चुकाना है।

पैसे का दूसरा ट्रैक

क्षमता के आंकड़े के पीछे पैसे की एक अलग कहानी भी चलती है। जनवरी 2026 तक SolarQuarter की रिपोर्ट के मुताबिक 25 लाख से ज्यादा घरों में इंस्टॉलेशन हो चुका था, ₹13,926 करोड़ सब्सिडी बांटी जा चुकी थी, 7.7 लाख से ज्यादा घरों का बिल पूरी तरह शून्य दर्ज हुआ। 8.3 लाख से ज्यादा लोन आवेदन भी मंजूर हो चुके थे — बैंक फाइनेंसिंग उतनी ही अहम है जितनी सीधी सब्सिडी। यह फाइनेंसिंग जानसमर्थ पोर्टल से चलती है, जहां 12 सरकारी बैंक बिना गारंटी लोन देते हैं। सितंबर 2025 तक इससे 5.79 लाख लोन, कुल ₹10,907 करोड़ के, मंजूर हुए।

बजट भी साल-दर-साल तेज हुआ — 2026-27 में ₹22,000 करोड़ का आवंटन, जबकि 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह ₹17,000 करोड़ था। करीब 29% की बढ़त, एक ही साल में।

राज्यों की असमान तस्वीर

कुल क्षमता का आंकड़ा यह नहीं बताता कि हर राज्य में योजना बराबर चल रही है। दिसंबर 2025 तक गुजरात सबसे आगे है — 5.15 लाख से ज्यादा सिस्टम, 7.41 लाख से ज्यादा लाभार्थी घर। महाराष्ट्र (3.92 लाख) और उत्तर प्रदेश (3.26 लाख) दूसरे-तीसरे नंबर पर। मई 2026 तक कुल 60.95 लाख आवेदन आए, 31.38 लाख इंस्टॉलेशन पूरे हुए, 38.40 लाख घर योजना से जुड़े — कुल स्थापित क्षमता 11,335.27 MW।

Whalesbook की रिपोर्ट यही तस्वीर पहले भी दिखा चुकी है — पश्चिमी और दक्षिणी राज्य आगे, पूर्वी-पूर्वोत्तर पीछे। गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश की बढ़त सिर्फ आबादी या मांग की वजह से नहीं है; वहां DISCOM का सहयोग और वेंडर नेटवर्क भी बेहतर माना जाता है, पूर्वी राज्यों में यही कड़ी कमजोर पड़ती है।

रोजगार का आंकड़ा — अनुमान, गिनती नहीं

रूफटॉप सोलर के साथ जो रोजगार का दावा जुड़ता है, वह बेबुनियाद नहीं। CEEW और NRDC के साझा अध्ययन के मुताबिक 2030 तक भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य 44 लाख नौकरियां बना सकते हैं, और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रूफटॉप सोलर का होगा। वजह तकनीकी है — रूफटॉप सोलर हर मेगावाट पर करीब 45 FTE जॉब-ईयर बनाता है, ग्राउंड-माउंटेड सोलर में यह सिर्फ 1, पवन ऊर्जा में करीब 0.6। रूफटॉप सोलर हर घर या दुकान पर अलग से लगता है, एक बड़े प्लांट की तरह एक जगह नहीं — इसलिए हर इंस्टॉलेशन के लिए अलग सर्वे, डिजाइन, वायरिंग, ग्रिड कनेक्शन चाहिए। CEEW के सीईओ अरुणाभा घोष ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया था कि विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा ज्यादा रोजगार बनाती है, और स्थायी रोजगार के लिए कुशल प्रशिक्षण व पारदर्शी वर्कफोर्स डेटा में निवेश जरूरी है।

2023 से 2026 के बीच जुड़ी 6.5 लाख स्वच्छ ऊर्जा नौकरियों में से 62% अकेले रूफटॉप सोलर से आईं। लेकिन एक असंतुलन भी दर्ज है — सौर-पवन क्षेत्र के कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 11% है, रूफटॉप सोलर में यह थोड़ा बेहतर, 15%। एक पुराने IEA विश्लेषण ने इसे दूसरे तरीके से भी दर्ज किया था — रूफटॉप सोलर हर मेगावाट पर करीब 25 नौकरियां बनाता है, यूटिलिटी-स्केल सोलर या पवन से 7 से 20 गुना ज्यादा, जिनमें करीब दो-तिहाई (16) को मध्यम या उच्च कौशल चाहिए। लेकिन उसी विश्लेषण में महिलाओं की भागीदारी सर्वेक्षित कंपनियों में सिर्फ 11% पाई गई, और साइट-आधारित भूमिकाओं में यह और कम।

44 लाख का आंकड़ा 2030 तक का प्रोजेक्शन है — आज तक बनी नौकरियों की गिनती नहीं।

जो रफ्तार रोकता है

IEA और CEEW के साझा विश्लेषण के मुताबिक केंद्र-राज्य स्तर पर नीतिगत-प्रशासनिक अड़चनें, सीमित फाइनेंसिंग विकल्प और DISCOMs की हिचकिचाहट रूफटॉप सोलर की रफ्तार रोकती हैं। यह हिचकिचाहट बेवजह नहीं। जून 2026 के Whalesbook विश्लेषण के मुताबिक पूर्वी राज्यों के कई DISCOMs आर्थिक रूप से कमजोर हैं और रूफटॉप सोलर को अपने राजस्व के लिए सीधा खतरा मानते हैं — जो घर खुद बिजली बनाता है, वह उतनी कम DISCOM से खरीदता है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2026 की पहली तिमाही में देश की रूफटॉप सोलर क्षमता 125% बढ़ी, पर यह बढ़त बराबर नहीं बंटी — पश्चिम-दक्षिण आगे, पूर्व-पूर्वोत्तर सप्लाई चेन और नियामकीय देरी में उलझे रहे।

तकनीकी अड़चनें भी हैं। नई गाइडलाइंस में 10 kW तक के सिस्टम पर नेट-मीटरिंग, उससे बड़े पर ग्रॉस-मीटरिंग अनिवार्य है — ग्रिड में वापस गई बिजली का मुआवजा राज्य-दर-राज्य अलग नियम से तय होता है। इससे योजना समझना और उसका फायदा उठाना उतना आसान नहीं रहता जितना सब्सिडी का आंकड़ा सुनने में लगता है। CEEW के पुराने सर्वे ने पूर्वी दिल्ली में यह भी पाया था कि रूफटॉप सोलर न लगवाने की सबसे बड़ी दो वजहें जागरूकता की कमी और भरोसेमंद सोलर कंपनियों की कमी थीं — पैसा या सब्सिडी नहीं। अड़चन सिर्फ नीति में नहीं, जमीन पर भरोसे की कमी में भी है।

एक शर्त जो देर से पता चलती है

सब्सिडी सिर्फ तभी मिलती है जब लगे पैनल ALMM सूची में हों। जुलाई 2026 की Websol Energy रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय पोर्टल आवेदन के समय ही यह जांचता है, DISCOM कमीशनिंग पर दोबारा पुष्टि करता है। मॉड्यूल सूची में न हों तो सब्सिडी दावा खारिज — ज्यादातर मामलों में कोई राहत तंत्र नहीं। वेंडर चुनने की गलती सीधे जेब पर असर डाल सकती है। यही रिपोर्ट बताती है कि 1 करोड़ घरों का लक्ष्य, 2-3 kW औसत क्षमता के हिसाब से, अगले तीन-चार साल में मॉड्यूल निर्माताओं के लिए 25-30 GW मांग बना सकता है — यह योजना सिर्फ उपभोक्ता तक सीमित नहीं, मॉड्यूल निर्माताओं और EPC ठेकेदारों के लिए भी बड़ा बाजार बना रही है।

जो साफ नहीं है

क्षमता बढ़ने से यह नहीं निकलता कि हर घर का बिल एक समान घटेगा, या हर जगह बराबर रोजगार बनेगा। असल बचत सिस्टम की क्षमता, बिजली खपत, स्थानीय टैरिफ, धूप, नेट मीटरिंग और उपयोग के पैटर्न पर निर्भर करती है। रोजगार के आंकड़े भी प्रोजेक्शन हैं, गिनती नहीं — 45 FTE प्रति मेगावाट एक अध्ययन की गणना-पद्धति पर टिका है, जिसमें बिक्री से लेकर रखरखाव तक सारी भूमिकाएं जोड़ी गई हैं, और यह अलग-अलग राज्यों-शहरों में एक जैसा नहीं बंटेगा। कोई तय payback period बताना भी अभी संभव नहीं — यह हर घर में अलग बैठेगा। DISCOM का रवैया राज्यों में कितना बदलेगा, इसका कोई तय जवाब फिलहाल दस्तावेजों में दर्ज नहीं है।


आज का मतलब

31 अगस्त 2026 तक देश की रूफटॉप सोलर क्षमता 32.59 GW है, सरकार ने इसके लिए ₹75,021 करोड़ रखे हैं। जुलाई 2026 में इंस्टॉलेशन अब तक की सबसे तेज रफ्तार पर था। साथ ही यह भी दर्ज तथ्य है कि पूर्वी राज्यों में DISCOMs की हिचकिचाहट और असमान क्षेत्रीय बढ़त अब भी बनी हुई है, और रोजगार के बड़े आंकड़े अभी अनुमान हैं, नतीजा नहीं।

पैसा, क्षमता, रफ्तार — तीनों दर्ज तथ्य हैं। इससे आगे का हिसाब — बिल कितना घटेगा, कारोबार कितना बनेगा, किस राज्य में कितनी तेजी आएगी — अभी हर घर और हर इलाके का अपना जवाब है।

स्रोत: MNRE भौतिक उपलब्धियां (31 अगस्त 2026); PM-Surya Ghar Muft Bijli Yojana दिशानिर्देश व स्वीकृति आदेश (16 मार्च 2024); राष्ट्रीय रूफटॉप सोलर पोर्टल; Business Standard (जनवरी 2025, जून 2026); pv magazine (5 अगस्त 2026); Angel One न्यूज़ (17 फरवरी 2026); Whalesbook विश्लेषण (23 जून 2026); SolarQuarter रिपोर्ट (3 जनवरी 2026); IBEF सरकारी योजना डेटा; CEEW–NRDC अध्ययन "Driving Energy Transition: Workforce, Skills, and Gender in India's Renewable Energy Sector"; IEA–CEEW रिपोर्ट "Unlocking the Economic Potential of Rooftop Solar PV in India"; IEA रिपोर्ट "Women Working in the Rooftop Solar Sector"; Drishti IAS/MNRE डेटा संकलन।

 
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