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क्या भारत का युवा खेती में लौट रहा है, या नौकरी की कमी उसे खेतों तक धकेल रही है?

द पॉइंट ब्लैंक ऑफिशियल

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क्या भारत का युवा खेती में लौट रहा है, या नौकरी की कमी उसे खेतों तक धकेल रही है?

पिछले दो सालों में बनी 8.3 करोड़ नई नौकरियों में से करीब 4 करोड़ सिर्फ कृषि क्षेत्र में जुड़ीं — यह लेख पड़ताल करता है कि क्या यह युवाओं के लिए एक नया अवसर है, या शहरी नौकरियों की कमी से मजबूरन खेत की ओर लौटने की कहानी।



1.बड़ा सवाल: नौकरी चाहिए, तो नौकरी है कहाँ?

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है — 15 से 29 साल के करीब 36 करोड़ युवा। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में "डेमोग्राफिक डिविडेंड" कहा जाता है, यानी वह ताकत जो किसी भी अर्थव्यवस्था को दशकों तक ऊँचाई पर ले जा सकती है। लेकिन इस ताकत का एक एक्सपायरी डेट भी है। अनुमान है कि 2030 के बाद भारत की कामकाजी उम्र वाली आबादी घटनी शुरू हो जाएगी। सवाल यह है कि जिस खिड़की से यह मौका दिख रहा है, क्या हम उसमें से गुजर पाएंगे — या यह खिड़की बंद होने से पहले ही युवाओं की एक बड़ी पीढ़ी बेरोजगारी और अनिश्चित कमाई में उलझी रह जाएगी।

और इसी सवाल के बीच एक चौंकाने वाला उलटफेर सामने आया है: जो नई नौकरियां देश में बन रही हैं, उनमें से बड़ा हिस्सा फैक्ट्री या ऑफिस में नहीं, बल्कि खेत में जुड़ रहा है।

2. हालिया अध्ययन क्या कहता है?

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की रिपोर्ट "स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026" — जिसका नेतृत्व शोधकर्ता रोज़ा अब्राहम ने किया — इस तस्वीर को आँकड़ों में सामने रखती है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ग्रेजुएट बेरोजगारी की दर करीब 40% पर टिकी है, और हैरानी की बात यह है कि यह आंकड़ा 1983 से 2023 तक, यानी चार दशकों से, 35% से 40% के बीच ही घूम रहा है। ग्रेजुएशन पूरा करने के एक साल के भीतर सिर्फ 7% पुरुष युवाओं को ही स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है, और सफेदपोश (white-collar) नौकरी तक पहुँचने वाले युवाओं का हिस्सा तो और भी कम, महज़ 3.7% है।

आर्थिक दबाव पढ़ाई पर भी असर डाल रहा है। 2017 में जिन युवाओं ने पैसों की तंगी के कारण पढ़ाई छोड़ी, वे कुल छोड़ने वालों का 58% थे; 2023 तक यह हिस्सा 72% तक पहुँच गया। यानी अब ज्यादा से ज्यादा युवा मजबूरी में पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं, करियर चुनने के लिए नहीं।

और सबसे अहम आँकड़ा यही है जिससे इस पूरी बहस की शुरुआत होती है: रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो सालों में भारत में करीब 8.3 करोड़ नई नौकरियां जुड़ीं, और इनमें से लगभग 4 करोड़ नौकरियां सिर्फ कृषि क्षेत्र में बनी हैं। यह ट्रेंड सामान्य विकास-गणित के उलट है, क्योंकि आमतौर पर आर्थिक तरक्की का मतलब होता है लोगों का खेती से निकलकर मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में जाना, न कि इसका उलटा।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) का 2025 का वार्षिक आँकड़ा भी इस पहेली में एक और परत जोड़ता है। इसमें समग्र बेरोजगारी दर घटकर 3.1% और युवा बेरोजगारी (15-29 वर्ष) 10.3% से 9.9% पर आ गई दिखाई गई है, और कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी लंबी अवधि में घटकर 43% रह गई है (1987-88 में यह 66% थी)। लेकिन इसी बीच PLFS के तिमाही आँकड़े एक अलग, ज्यादा बेचैन करने वाली तस्वीर दिखाते हैं — 2026 की एक तिमाही में युवा बेरोजगारी दर 15.9% तक पहुँच गई, जो एक साल पहले 14.6% थी, और श्रम बल भागीदारी दर भी घटी। यानी सालाना औसत भले स्थिर दिखे, लेकिन ज़मीन पर हर तिमाही युवाओं के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है। नीति आयोग की अगस्त 2026 में आई रिपोर्ट "Reimagining Skilling for Viksit Bharat @2047" इसी नब्ज़ पर उंगली रखती है — इसके मुताबिक सिर्फ 8.25% स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप काम कर रहे हैं। यानी समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं, शिक्षा और रोजगार के बीच के गहरे मिसमैच की भी है।

3. खेती में युवा क्यों बढ़ रहे हैं?

यहाँ असल पेचीदगी शुरू होती है, क्योंकि खेती की ओर लौटते युवाओं की कहानी एक नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग कहानियां हैं।

पहली कहानी मजबूरी की है। जब शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में पर्याप्त नौकरियां नहीं बन पातीं, तो जो युवा पढ़-लिखकर भी बेरोजगार रह जाता है, वह अंततः पुश्तैनी ज़मीन पर लौट आता है — क्योंकि वहाँ कम से कम कुछ काम और थोड़ी आमदनी की गुंजाइश रहती है। यह "स्वरोजगार" कम, और "आखिरी सहारा" ज़्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग और सेवा क्षेत्र इतनी नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहे कि गाँव से निकला हर पढ़ा-लिखा युवा वहीं खप सके, और बेमौसम बारिश जैसे मौसमी झटके इस दबाव को और बढ़ा देते हैं।

दूसरी कहानी अवसर और आधुनिकता की है। देश के कई पढ़े-लिखे युवा लाखों के पैकेज छोड़कर खेती और एग्री-बिज़नेस को करियर के तौर पर अपना रहे हैं — फूड प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन, मार्केटिंग और टेक्नोलॉजी की समझ के साथ। किसान उत्पादक संगठन (FPO), जैविक खेती, हाइड्रोपोनिक्स और एग्री-एक्सपोर्ट जैसे मॉडल अब खेती को सिर्फ मजबूरी नहीं, एक ठीक-ठाक कमाई वाला और सम्मानजनक विकल्प बनाते जा रहे हैं। सरकार और कृषि विश्वविद्यालय भी इस बदलाव को बढ़ावा दे रहे हैं — जैसे हरियाणा में कृषि विश्वविद्यालय द्वारा FPO को पेशेवर सहयोग देने की पहल, या उत्तराखंड में एग्री-स्टार्टअप को 25 लाख रुपए तक की ग्रांट।

असल सवाल यह नहीं है कि युवा खेत में है या नहीं — भारतीय समाज की एक पुरानी कहावत ही कहती है, "उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान।" सवाल यह है कि वह खेत में किस वजह से है — अवसर की तलाश में, या दरवाज़े बंद होने के बाद बचे इकलौते विकल्प के तौर पर।

4. सबसे बड़ा सवाल — क्या यह कमाई सुरक्षित है?

यहीं पर पूरी बहस का केंद्र है। खेती में लौटना तभी सम्मानजनक कदम कहा जा सकता है जब वहाँ स्थिर और सम्मानजनक आमदनी भी हो — वरना यह सिर्फ बेरोजगारी को छिपाने का एक तरीका बन जाता है।

आँकड़े यहाँ राहत नहीं देते। हाल के आर्थिक विश्लेषणों के मुताबिक, नियमित वेतन वाली नौकरी करने वाले पुरुषों की वास्तविक मासिक आय भी हाल की अवधि में करीब 6.4% घटी है, और महिलाओं की आय में यह गिरावट 12.5% तक दर्ज हुई है — यानी जिन नौकरियों को तुलनात्मक रूप से "सुरक्षित" माना जाता है, वहाँ भी कमाई कमजोर पड़ रही है। खेती और स्वरोजगार में स्थिति अक्सर इससे भी ज्यादा अस्थिर होती है, जहाँ मौसम, फसल के दाम और बाज़ार की मार सीधे जेब पर पड़ती है। रोज़गार विशेषज्ञों की राय में यह प्रवृत्ति खतरे की घंटी है, क्योंकि श्रम बल भागीदारी में गिरावट के साथ बेरोजगारी बढ़ना बताता है कि युवा नौकरी बाज़ार से मायूस होकर बाहर भी हो रहे हैं।

यही वह जगह है जहाँ "युवा खेत में लौट रहा है" वाली सुर्खी और "युवा खेत में फँस गया है" वाली सच्चाई के बीच का फर्क साफ होता है।

5. सरकार की रोजगार नीति क्या कहती है?

सरकार की तरफ से जवाब कई दिशाओं में आ रहा है। बजट 2026-27 में युवाओं और महिलाओं के रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर ध्यान तो है, लेकिन मनरेगा जैसी योजनाओं पर काम करने वाले विशेषज्ञ मौजूदा प्रावधानों को अब भी नाकाफी मानते हैं, खासकर तब जब योजना का क्रियान्वयन खेती के मौसम में कुछ महीनों के लिए टलता है।

कृषि-केंद्रित उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए RKVY-RAFTAAR जैसे कार्यक्रमों के तहत एग्री-स्टार्टअप्स को लाखों की ग्रांट, और स्टार्टअप इंडिया के तहत कृषि-नवाचार को अन्य क्षेत्रों के बराबर तरजीह दी जा रही है। उत्तर प्रदेश के स्तर पर भी हलचल दिखती है — मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कृषि विभाग के 3,446 प्राविधिक सहायकों समेत साढ़े तीन हज़ार से ज़्यादा युवाओं को नियुक्ति पत्र सौंपे, और अगले छह महीनों में एक लाख और सरकारी नौकरियां देने की घोषणा की। इसके अलावा यूपी स्टार्टअप पॉलिसी 2026 और मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास योजना के तहत नए उद्यमियों को आर्थिक मदद दी जा रही है।

लेकिन नीति आयोग की अपनी रिपोर्ट ही मान रही है कि इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और उद्योग के साथ तालमेल के बिना सिर्फ योजनाओं की घोषणा और डिग्रियों का बंटवारा काफी नहीं है — जब तक डिग्री को वास्तविक काम के कौशल में नहीं बदला जाता, अंतर बना रहेगा।

6. भारत की बड़ी तस्वीर

राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर एक साथ दो दिशाओं में जाती दिखती है। एक तरफ लंबी अवधि का ट्रेंड — कृषि से मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की ओर खिसकना, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, वेतनभोगी नौकरियों का धीरे-धीरे बढ़ना — भारत की संरचनात्मक प्रगति दिखाता है। दूसरी तरफ, पिछले दो वर्षों का ताज़ा उलटफेर — जहाँ हर दूसरी नई नौकरी खेत में बन रही है — यह चेतावनी देता है कि यह प्रगति फिलहाल भरोसे के लायक रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पा रही।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह तनाव और साफ नज़र आता है, जहाँ ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है और साथ ही हर साल लाखों शिक्षित युवा नौकरी बाज़ार में उतरते हैं। सरकार की सरकारी भर्तियों और स्टार्टअप योजनाओं की घोषणाएं इस दबाव को कुछ हद तक कम करने की कोशिश हैं, लेकिन जिस रफ्तार से नौकरी चाहने वालों की संख्या बढ़ रही है, उस रफ्तार से गुणवत्तापूर्ण अवसर पैदा होना अभी भी एक चुनौती है।

7. निष्कर्ष

खेती में युवा होना समस्या नहीं है — भारत की सभ्यता और अर्थव्यवस्था दोनों की जड़ें वहीं हैं, और एक समझदार, तकनीक-सक्षम युवा पीढ़ी अगर सचमुच खेती को अपनाए, तो यह देश की तस्वीर बदल सकती है। असली सवाल यह है: क्या यह युवा खेती से सम्मानजनक और स्थिर आय कमा रहा है, या वह सिर्फ बेरोजगारी के आँकड़ों से बचने के लिए खेत की शरण में है?

"स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026" जैसे अध्ययन बताते हैं कि जवाब अभी अनिश्चय में लटका है — शिक्षित युवाओं की एक बड़ी संख्या कृषि क्षेत्र में जा रही है, लेकिन कमाई, नियमित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के सवाल अब भी जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं। भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड 2030 के बाद घटना शुरू हो जाएगा। तब तक अगर यह सवाल सुलझ नहीं पाया, तो दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश अपने सबसे बड़े मौके को हाथ से जाते देख सकता है।

संदर्भ
Azim Premji University — State of Working India 2026 (रिपोर्ट, लेखक: रोज़ा अब्राहम एवं अन्य): https://azimpremjiuniversity.edu.in/publications/2026/report/swi-2026
आजतक — "डिग्री है, नौकरी नहीं! 40 साल में नहीं बदली तस्वीर, 40 पर्सेंट ग्रेजुएट बेरोजगार" (18 मार्च 2026): https://www.aajtak.in/education/career/story/graduate-unemployment-economic-hardship-youth-education-india-report-ntcpmm-dskc-2500435-2026-03-18
NSO / MoSPI — Periodic Labour Force Survey Annual Report 2025
The Policy Edge — "Q1 2026 PLFS Shows Youth Unemployment Rising as Labour Participation Softens": https://www.policyedge.in/p/q1-2026-plfs-shows-youth-unemployment-rising-as-labour-participation-softens
IDR हिंदी — "बजट 2026 में युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार": https://hindi.idronline.org/article/budget-2026-men-yuwaao-or-mahilaao-ke-liye-rojgaar/
India Daily — नीति आयोग रिपोर्ट "Reimagining Skilling for Viksit Bharat @2047" पर रिपोर्ट: https://www.theindiadaily.com/jobs/niti-aayog-graduates-jobs-8-25-percent-education-skills-mismatch-report-2026-news-131553
UPUKLive — यूपी स्टार्टअप पॉलिसी 2026 एवं संबंधित युवा योजनाएं: https://upuklive.com/national/up-youth-batting-1-lakh-government-jobs-100-16008.html
Indian Opinion News — UP कृषि विभाग भर्ती एवं CM योगी की घोषणा: https://www.indianopinionnews.com/up-jobs-2026-3572-appointment-letters-one-lakh-government-jobs/

टैग्स: खेती · युवा बेरोजगारी · कृषि क्षेत्र · नौकरी संकट · डेमोग्राफिक डिविडेंड · ग्रेजुएट बेरोजगारी · स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया · रोजगार नीति · एग्री स्टार्टअप · ग्रामीण भारत · उत्तर प्रदेश रोजगार · स्किल गैप
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