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निशाने पर कलम: एक दशक में पत्रकार कैसे शिकार बनते गए

द पॉइंट ब्लैंक ऑफिशियल

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निशाने पर कलम: एक दशक में पत्रकार कैसे शिकार बनते गए

2014 से अब तक भारत में सैकड़ों पत्रकार हमलों, हत्याओं और कैद का शिकार हुए — और लगभग हर मामले में दोषी बचकर निकल गए। दुनिया में भी यही दशक पत्रकारों के लिए अब तक का सबसे ख़ूनी साबित हुआ है।



बेंगलुरु के एक घर के बाहर गोलियों की आवाज़, शाहजहाँपुर में एक पत्रकार का जलता हुआ शरीर, हाथरस जाते वक़्त रास्ते में हुई गिरफ़्तारी, और श्रीनगर के एक दफ़्तर के बाहर बिना दावेदार के हुई एक हत्या — पिछले एक दशक की भारतीय पत्रकारिता का इतिहास ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है। यह सिर्फ़ अलग-थलग वारदातें नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा पैटर्न है जिसे स्वतंत्र संस्थाओं ने बार-बार आँकड़ों में दर्ज किया है — और जिस पर भारत सरकार का रुख़ लगातार यह रहा है कि उसके पास इसका कोई केंद्रीकृत हिसाब ही नहीं है।

आंकड़े क्या कहते हैं
2019 में प्रकाशित अध्ययन 'गेटिंग अवे विद मर्डर' ने पहली बार इस समस्या का पैमाना सामने रखा: 2014 से 2019 के बीच भारत में पत्रकारों पर 200 से अधिक गंभीर हमले दर्ज हुए। इसी दौर में 40 पत्रकारों की जान गई, जिनमें से 21 की हत्या सीधे उनकी रिपोर्टिंग की वजह से हुई थी। रिपोर्ट का सबसे तीखा निष्कर्ष यह था कि इनमें से एक भी मामले में आज तक किसी दोषी को सज़ा नहीं मिली।

200+ गंभीर हमले, 2014–19 के बीच
28 पत्रकारों की हत्या, 2014–24
0 दोषसिद्धि, 2014 के बाद से आज तक
151 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की 2025 रैंक

2026 में जारी CPJ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2025 में सिर्फ़ 2 हत्याओं के साथ भी दुनिया में छठे स्थान पर रहा — पाकिस्तान भी उसी पायदान पर। और यह सिलसिला सिर्फ़ हत्याओं तक सीमित नहीं है: फेमिनिज़म इन इंडिया की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार अकेले 2024–25 के बीच पत्रकारिता से जुड़े अधिकारों के उल्लंघन के करीब 250 मामले दर्ज किए गए। राज्यसभा में उठाए गए एक सवाल के जवाब में यह भी सामने आया कि 1990 से अब तक देश में कुल 80 पत्रकार मारे जा चुके हैं, और अधिकतर मामले आज भी अदालतों में लंबित हैं।

"2014 के बाद से भारत में पत्रकारों पर हमलों के किसी भी मामले में — जहाँ निशाना उनका खोजी काम था — एक भी दोषसिद्धि दर्ज नहीं हुई।"
— 'गेटिंग अवे विद मर्डर' अध्ययन, 2019

हमले आख़िर होते क्यों हैं?

जब इन मामलों की तह में जाया जाए, तो एक साफ़ पैटर्न उभरता है। छोटे शहरों और ज़िला मुख्यालयों में काम करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं — क्योंकि वहाँ उनका सामना सीधे स्थानीय ताक़त से होता है, न कि किसी दूर की सत्ता से।

भ्रष्टाचार और अवैध खनन: रेत माफ़िया, ज़मीन कब्ज़े और स्थानीय ठेकेदारी के गठजोड़ पर लिखना — भारत में पत्रकार-हत्याओं का सबसे बड़ा एकल कारण।

सत्ता-विरोधी और राजनीतिक रिपोर्टिंग: नेताओं, मंत्रियों या स्थानीय रसूख़दारों के खिलाफ़ खबर छापने पर धमकी और हमला।

साम्प्रदायिक व संवेदनशील इलाकों की कवरेज: कश्मीर जैसे क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार लगातार निशाने पर रहे हैं।

कठोर कानूनों का इस्तेमाल: राजद्रोह, UAPA और IT एक्ट जैसे प्रावधान कई बार बिना मुक़दमे के लंबी क़ैद का ज़रिया बन जाते हैं।

सार्वजनिक आयोजनों में सीधी मारपीट: रैलियों और प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पुलिस या समर्थकों द्वारा हमला।

जो मामले सुर्खियों में रहे — और जहाँ आज खड़े हैं

जून 2015 · शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश
जगेंद्र सिंह
फेसबुक पर पत्रकारिता कर रहे जगेंद्र सिंह को कथित तौर पर एक मंत्री के इशारे पर घर में घुसकर ज़िंदा जला दिया गया। एक हफ़्ते बाद अस्पताल में उनकी मौत हुई। मंत्री पर हत्या की साज़िश का मामला दर्ज हुआ।

वर्षों बाद भी मुक़दमा अधूरा
मई 2016 · सीवान, बिहार
राजदेव रंजन,
गोली मारकर हत्या के इस मामले की जाँच CBI को सौंपी गई। सुनवाई के दौरान एक ज़िंदा गवाह को मृत बताकर पेश करने जैसी गड़बड़ियाँ सामने आईं।

CBI जाँच, सुनवाई जारी
जून 2017 · बेंगलुरु, कर्नाटक
गौरी लंकेश
घर के बाहर गोली मारकर हत्या। बैलिस्टिक जाँच में वही पिस्तौल पाई गई जो विद्वान एम.एम. कलबुर्गी की 2015 की हत्या में इस्तेमाल हुई थी। नौ साल में मामला सातवें जज के पास पहुँचा — छह पहले वाले या तो प्रमोट हुए या तबादला हो गया। 18 में से 16 आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं, एक फ़रार है।

नौ साल बाद भी सुनवाई अधूरी
जून 2018 · श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर
शुजात बुखारी
'राइज़िंग कश्मीर' के संपादक की उनके दफ़्तर के बाहर अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। दो सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। किसी संगठन ने ज़िम्मेदारी नहीं ली।

आज तक अनसुलझा
अक्टूबर 2020 · मथुरा, उत्तर प्रदेश
सिद्दीक कप्पन
हाथरस गैंगरेप-हत्याकांड को कवर करने जा रहे केरल के पत्रकार को रास्ते में गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह, UAPA और मनी-लॉन्ड्रिंग के मामले लगे। क़रीब 28 महीने जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट से ज़मानत मिली।

ज़मानत पर रिहा, मुक़दमा जारी
मई 2024 · रायबरेली, उत्तर प्रदेश
राघव त्रिवेदी
गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रैली में एक महिला से बातचीत करने पर पत्रकार को कथित तौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने पुलिस की मौजूदगी में बुरी तरह पीटा।

विपक्ष का विरोध, जाँच का दावा
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की गिरती रैंक
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) हर साल 180 देशों में प्रेस की आज़ादी को रैंक करता है। भारत की स्थिति एक दशक में लगातार बिगड़ती गई — हालाँकि सरकार ख़ुद इस इंडेक्स की पद्धति को ही ख़ारिज करती रही है।

स्रोत: Reporters Without Borders, World Press Freedom Index (180 देशों में रैंक)

वर्ष भारत की रैंक टिप्पणी
2014 140 मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की शुरुआत
2016 133 दशक की सबसे बेहतर रैंक
2019 140 —
2021 142 —
2022 150 NDTV का अधिग्रहण, मीडिया स्वामित्व पर चिंता
2023 161 दशक की सबसे ख़राब रैंक
2024 159 —
2025 151 मामूली सुधार, फिर भी "गंभीर" श्रेणी में

भारत का समग्र स्कोर भी 2014 के 40.34 अंकों से गिरकर 2024 में 31.28 पर आ गया — यानी प्रेस-स्वतंत्रता का स्तर घटकर महज़ 31% रह गया। सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने लोकसभा में साफ़ कहा था कि सरकार इस रैंकिंग को नहीं मानती, इसे "अपारदर्शी पद्धति" और "कम सैंपल साइज़" पर आधारित बताते हुए ख़ारिज किया। वहीं एक अन्य संसदीय जवाब में यह भी सामने आया कि NCRB पत्रकारों की गिरफ़्तारी का कोई अलग केंद्रीय आँकड़ा सिरे से रखता ही नहीं — क्योंकि पुलिस और क़ानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है।

ग़ौर करने वाली बात: भारत सरकार के पास पत्रकारों पर हमलों, गिरफ़्तारियों या उन पर दर्ज मुक़दमों का कोई एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस मौजूद नहीं है — यह बात ख़ुद सरकार ने संसद में स्वीकार की है। यही वजह है कि इस विषय पर लगभग पूरी तरह स्वतंत्र संस्थाओं (CPJ, RSF, प्रेस काउंसिल की उप-समितियाँ) के आँकड़ों पर निर्भर रहना पड़ता है।
दुनिया भर में — अब तक का सबसे ख़ूनी दौर

अगर भारत की तस्वीर चिंताजनक है, तो वैश्विक तस्वीर उससे भी ज़्यादा भयावह है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ), जो 1992 से यह आँकड़ा रख रही है, ने पिछले तीन वर्षों को पत्रकारिता के इतिहास का सबसे ख़ूनी दौर बताया है।

स्रोत: Committee to Protect Journalists, वार्षिक रिपोर्ट्स
वर्ष दुनिया भर में मारे गए पत्रकार मुख्य कारण
2023 99 गाज़ा युद्ध — 72 फ़िलिस्तीनी पत्रकार
2024 124 2007 के पुराने रिकॉर्ड (113) से आगे निकला आँकड़ा
2025 129 लगातार दूसरा रिकॉर्ड वर्ष

CPJ के अनुसार 1992 में आँकड़े रखना शुरू करने के बाद से इज़राइल किसी भी एक सरकार द्वारा सबसे ज़्यादा पत्रकारों की जान लेने वाला देश बन चुका है — 2025 की कुल मौतों में से लगभग दो-तिहाई के लिए वह ज़िम्मेदार रहा।

अक्टूबर 2023 में गाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद से जून 2026 तक गाज़ा, यमन, लेबनान, इज़राइल और ईरान में मिलाकर 263 से अधिक पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे जा चुके हैं।

अगस्त 2025 में अल-जज़ीरा के पत्रकार अनस अल-शरीफ़ और उनके साथियों की एक इज़राइली हवाई हमले में हुई मौत ने दुनिया भर में विरोध-प्रदर्शनों को जन्म दिया।

इसके अलावा सूडान, पाकिस्तान, मेक्सिको, म्याँमार, सीरिया, इराक़ और हैती भी पत्रकारों के लिए बेहद ख़तरनाक बने रहे। पड़ोसी पाकिस्तान में 2020 के दशक में पत्रकार-हत्याओं में तेज़ उछाल देखा गया — 2025 तक कम से कम 20 से 30 पुष्ट कार्य-संबंधी हत्याएँ दर्ज हुईं।

बांग्लादेश में हाल के राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा पत्रकारों पर हमले और 167 पत्रकारों के प्रेस-कार्ड रद्द किए जाने जैसी घटनाएँ भी सामने आईं।

सोशल मीडिया पर उठी आवाज़ें

हर बड़ी घटना के बाद X (पूर्व ट्विटर) पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आना अब आम हो चुका है। रायबरेली में पत्रकार राघव त्रिवेदी की पिटाई के बाद कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने पुलिस की मौजूदगी में हुई इस घटना को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए पोस्ट किया, जबकि राहुल गांधी ने भारत की गिरती प्रेस फ्रीडम रैंकिंग का हवाला देकर सरकार पर मीडिया को दबाने का आरोप लगाया। Internet Freedom Foundation जैसी संस्थाएँ नियमित रूप से संसद में दिए गए सरकारी जवाबों पर तथ्यात्मक प्रतिक्रिया देती रही हैं।

वैश्विक स्तर पर CPJ और RSF के आधिकारिक हैंडल हर बड़ी पत्रकार-हत्या या गिरफ़्तारी पर सबसे पहले और सबसे प्रामाणिक बयान जारी करने वाले स्रोत माने जाते हैं।

@pressfreedom — CPJ
@RSF_inter — RSF
@internetfreedom — IFF
@thewire_in

कॉपीराइट नियमों के तहत मूल ट्वीट का टेक्स्ट या स्क्रीनशॉट यहाँ ज्यों-का-त्यों पुनः प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऊपर दिए गए सत्यापित हैंडल पर जाकर मूल पोस्ट देखे जा सकते हैं।

निष्कर्ष
इस पूरी पड़ताल से जो तस्वीर उभरती है, वह दंड-मुक्ति (impunity) की है — भारत में पत्रकारों पर हमलों के मामलों में दोषसिद्धि दर लगभग शून्य के बराबर रही है, जिससे अपराधियों को किसी क़ानूनी नतीजे का डर नहीं रहता। साथ ही, केंद्रीकृत आँकड़ों की अनुपस्थिति इस समस्या के असली पैमाने को समझना और मुश्किल बना देती है।

भारत में हमलों की जड़ें ज़्यादातर स्थानीय भ्रष्टाचार और ज़मीन-खनन माफ़िया में हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर युद्ध-क्षेत्र — विशेषकर गाज़ा — अब पत्रकारों की मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं। दोनों ही मोर्चों पर एक बात समान है: जवाबदेही की कमी, और उसी के साथ हर साल बढ़ता जोखिम।

प्रमुख स्रोत
Committee to Protect Journalists (cpj.org) — वार्षिक रिपोर्ट्स, 2023–2026
Reporters Without Borders / RSF — World Press Freedom Index, 2014–2025
The Wire / द वायर हिंदी — 'Getting Away With Murder' अध्ययन एवं केस-कवरेज
लोकसभा व राज्यसभा के आधिकारिक संसदीय जवाब (mha.gov.in)
Deccan Herald, AajTak, Free Press Journal, The News Minute, Feminism in India, CBS News, Al Jazeera

यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध, सत्यापित समाचार स्रोतों और आधिकारिक संगठनों के डेटा पर आधारित है। कॉपीराइट कारणों से मूल समाचार लेखों, सरकारी दस्तावेज़ों या सोशल मीडिया पोस्ट का पूरा टेक्स्ट यहाँ पुनः प्रस्तुत नहीं किया गया है — विस्तृत जानकारी के लिए कृपया मूल स्रोतों का संदर्भ लें।

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