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भारत में एयरपोर्ट्स की बड़ी बिक्री: घाटा जनता का, मुनाफा किसका?


THE POINT BLANK — EDIT/2026/AVIATION25 अगस्त 2026

विश्लेषण · नीति

भारत में एयरपोर्ट्स की बड़ी बिक्री:
घाटा जनता का, मुनाफा किसका?

सरकार ने 11 और हवाई अड्डों के निजीकरण को सैद्धांतिक मंज़ूरी दे दी है — आंकड़े और इतिहास बताते हैं कि यह कहानी सिर्फ़ "आधुनिकीकरण" की नहीं है।

सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एप्रेज़ल कमेटी (PPPAC) ने 4 अगस्त 2026 को हुई अपनी 149वीं बैठक में नागर विमानन मंत्रालय के उस प्रस्ताव को हरी झंडी दी, जिसमें 11 एयरपोर्ट्स को पांच बंडलों में निजी हाथों में सौंपने की योजना है। यह प्रस्ताव अब अंतिम मंज़ूरी के लिए फिर से PPPAC के पास जाएगा, उसके बाद आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) के सामने रखा जाएगा — यानी अभी यह प्रक्रिया शुरुआती दौर में ही है, अंतिम फ़ैसला बाकी है।
पर सरकार इसे भले ही "इन्फ्रास्ट्रक्चर आधुनिकीकरण" कहे, आंकड़े और इतिहास कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
कौन-कौन से एयरपोर्ट दांव पर हैं?

प्रस्ताव के मुताबिक पांच बंडल कुछ इस तरह बनाए गए हैं — हर बंडल में एक बड़े एयरपोर्ट को एक या दो छोटे एयरपोर्ट के साथ जोड़ा गया है, और हर बंडल 50 साल की एक ही रियायत (concession) के तहत एक ऑपरेटर को दिया जाएगा:

01
अमृतसर + कांगड़ा (गग्गल)
02
वाराणसी + गया + कुशीनगर
03
भुवनेश्वर + हुबली
04
रायपुर + औरंगाबाद
05
तिरुचिरापल्ली + तिरुपति

यानी छोटे, अभी तक घाटे में चल रहे एयरपोर्ट्स को बड़े, मुनाफे वाले एयरपोर्ट्स के साथ "बंडल" कर दिया गया है ताकि निजी कंपनियों के लिए यह सौदा आर्थिक रूप से आकर्षक बने।

टैक्सपेयर ट्रैप: पहले बनाओ पब्लिक पैसे से, फिर बेचो

एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने बरसों में हज़ारों करोड़ रुपये टैक्सपेयर के पैसे से इन टियर-2 शहरों के एयरपोर्ट्स को बनाने और अपग्रेड करने में लगाए हैं। एक बार जब ये एसेट यात्री-भार बढ़ाने और मुनाफा कमाने लायक हो जाते हैं, तब इन्हें 50 साल की लंबी लीज़ पर निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाता है। यानी जोखिम और शुरुआती निवेश का बोझ जनता उठाती है, और जब एसेट "प्राइम" हो जाता है, तब उसका दीर्घकालिक मुनाफा एक निजी कंपनी के खाते में चला जाता है।

एकाधिकार की आशंका — इतिहास खुद गवाह है

यह चिंता सिर्फ काल्पनिक नहीं है। इसी PPPAC बैठक में समिति ने खुद एविएशन सेक्टर में "ऑलिगोपॉलिस्टिक" यानी मुट्ठी भर कंपनियों के दबदबे और ओवर-लीवरेजिंग के जोखिम पर चिंता जताई। जवाब में नागर विमानन मंत्रालय ने कहा कि इस बार एक बोलीदाता को दिए जाने वाले बंडलों की संख्या पर सीमा (cap) तय की जाएगी — लेकिन इसकी रूपरेखा अभी अंतिम रूप ले रही है और आगे की मंज़ूरी के प्रस्ताव के साथ जमा की जाएगी।

रिकॉर्ड से
2019 के पहले दौर में सरकार ने छह एयरपोर्ट — लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर, मंगलुरु, तिरुवनंतपुरम और गुवाहाटी — निजीकरण के लिए रखे थे। प्रतिस्पर्धी बोली के बाद अडानी समूह ने सभी छह एयरपोर्ट्स की बोली जीत ली — जबकि नीति आयोग और वित्त मंत्रालय, दोनों ने एक बोलीदाता को अधिकतम दो एयरपोर्ट देने की सीमा और पूर्व संचालन-अनुभव अनिवार्य करने की सिफ़ारिश की थी। PPPAC ने उस वक़्त ये दोनों अहम सिफ़ारिशें ठुकरा दी थीं।

अब तीसरे दौर में बोलीदाता एकाग्रता (bidder concentration) का मुद्दा फिर सुर्खियों में है, और यही वजह है कि सरकार इस बार कैप लगाने की बात कह रही है — लेकिन जब तक इसकी अंतिम शर्तें सामने नहीं आतीं, यह सिर्फ एक इरादा भर है, गारंटी नहीं।

"रेगुलेटेड" होते हुए भी बोझ यात्री पर

हवाई किराए से जुड़े एरोनॉटिकल चार्जेज़ और यूज़र डेवलपमेंट फ़ीस (UDF) भले ही सांविधिक नियामक एयरपोर्ट इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (AERA) के दायरे में आते हों, लेकिन यह ढांचा निजी ऑपरेटर के पूंजीगत निवेश पर रिटर्न को व्यावहारिक रूप से सुनिश्चित करता है। पहले के अनुभवों में देखा गया है कि निजी ऑपरेटर अक्सर अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर की भरपाई के लिए AERA से बड़ी टैरिफ बढ़ोतरी हासिल कर लेते हैं। इसके ऊपर रिटेल और पार्किंग जैसे नॉन-एरोनॉटिकल चार्जेज़ भी जुड़ते हैं — नतीजा यह होता है कि आम मध्यम-वर्गीय यात्री को इसका खर्च उठाना पड़ता है।

— · — · —

बात सिर्फ एक नीति की नहीं है

यह कोई खुला, प्रतिस्पर्धी बाज़ार मॉडल नहीं है, जहां कई खिलाड़ी बराबरी से टिके रहें। यह सार्वजनिक पूंजी से बने एसेट्स को निजी हाथों में — और इतिहास को देखें तो अक्सर मुट्ठी भर बड़े समूहों के हाथों में — सौंपने की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। सरकार का यह भी कहना है कि बंडलिंग मॉडल छोटे, कम-मुनाफे वाले एयरपोर्ट्स को बड़े एयरपोर्ट्स के रेवेन्यू और ऑपरेशनल सिनर्जी से आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के मक़सद से लाया गया है — यानी सरकार का तर्क है कि इसके बिना ये छोटे एयरपोर्ट लगातार घाटे में ही चलते रहेंगे। इस तर्क में कुछ दम है, लेकिन असली सवाल यह है: क्या यह मॉडल बिना बोलीदाता-एकाग्रता के लागू हो सकता है, और क्या इसकी शर्तें यात्रियों और AAI कर्मचारियों दोनों के हितों की रक्षा करती हैं?

जब तक अंतिम प्रस्ताव और बंडल-कैप की शर्तें सार्वजनिक नहीं होतीं, यह देखना ज़रूरी होगा कि सरकार इस बार 2019 वाली गलती दोहराती है, या असल में सबक सीखती है।

स्रोत: द हिंदू (25 अगस्त 2026) · PPPAC की 149वीं बैठक का कार्यवृत्त एवं संबंधित सरकारी दस्तावेज़ों पर आधारित रिपोर्टिंग।
thepointblankoffici.in के लिए मूल विश्लेषण।

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