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ग्रामीण भारत की कमाई क्यों थम गई? 52.6% परिवारों की आय एक साल में नहीं बढ़ी

द पॉइंट ब्लैंक ऑफिशियल

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ग्रामीण भारत की कमाई क्यों थम गई? 52.6% परिवारों की आय एक साल में नहीं बढ़ी

NABARD के जुलाई 2026 सर्वे में ग्रामीण परिवारों की आय, बचत और कर्ज की तस्वीर कमजोर हुई है। खर्च अभी भी चल रहा है, लेकिन कमाई की रफ्तार उसके साथ नहीं चल रही।



गांव में कमाई रुकने का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि किसी परिवार की आमदनी नहीं बढ़ी। इसका असर बाजार की दुकान से लेकर खेत की अगली बुवाई, बच्चों की पढ़ाई और घर की बचत तक जाता है।

NABARD के जुलाई 2026 के Rural Economic Conditions & Sentiments Survey में 52.6 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि पिछले एक साल में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं हुआ। 19.8 फीसदी परिवारों ने आय घटने की बात कही। आय बढ़ने की बात कहने वाले परिवारों की हिस्सेदारी सिर्फ 27.7 फीसदी रही।

यानी सर्वे में शामिल करीब 72 फीसदी परिवार ऐसे थे जिन्हें पिछले एक साल में आय बढ़ने का फायदा नहीं मिला।

यह आंकड़ा इसलिए ध्यान खींचता है क्योंकि NABARD का यह सर्वे सितंबर 2024 से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति और उनके भरोसे को नियमित रूप से ट्रैक कर रहा है। जुलाई 2026 का 27.7 फीसदी का आंकड़ा इस पूरी श्रृंखला में आय बढ़ने की सबसे कम रिपोर्ट की गई हिस्सेदारी है।

कमाई की रफ्तार यहां तक कैसे पहुंची?

नवंबर 2025 में 42.2 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने अपनी आय बढ़ने की बात कही थी। मई 2026 में यह हिस्सा घटकर 29.6 फीसदी और जुलाई में 27.7 फीसदी रह गया।

दूसरी तरफ, जिन परिवारों ने कहा कि आय में कोई बदलाव नहीं हुआ, उनका हिस्सा बढ़कर 52.6 फीसदी हो गया।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर गांव में आय गिर गई है। आंकड़ा ऐसा नहीं कहता। बड़ी संख्या में परिवारों की आय वहीं रही, जबकि करीब पांचवां हिस्सा आय घटने की बात कर रहा है।

यही फर्क इस रिपोर्ट को समझने के लिए जरूरी है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सिर्फ “कमाई घटी” कह देना सही तस्वीर नहीं होगी। ज्यादा सटीक बात यह है कि आय बढ़ने की रफ्तार कमजोर हुई है और बड़ी संख्या में परिवारों की कमाई पिछले स्तर पर अटकी हुई है।

खर्च कमाई से आगे निकल रहा है

आय में ठहराव के बावजूद घर का खर्च बंद नहीं होता।

NABARD के सर्वे में 74.1 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने बताया कि पिछले एक साल में उनका उपभोग खर्च बढ़ा। मई 2026 में यह हिस्सा 77.2 फीसदी था।

ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का औसतन 66.5 फीसदी हिस्सा उपभोग पर खर्च कर रहे हैं। 12.5 फीसदी आय कर्ज चुकाने में जा रही है और करीब 13.6 फीसदी वित्तीय बचत में।

यानी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों में निकल रहा है।

उपभोग खर्च के भीतर भोजन की हिस्सेदारी 54.6 फीसदी है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर 24.1 फीसदी तथा ईंधन और परिवहन पर 16.4 फीसदी खर्च बताया गया है।

इन आंकड़ों से एक सीधी तस्वीर निकलती है—कमाई की वृद्धि धीमी होने के बावजूद जरूरी खर्च को उसी अनुपात में रोकना आसान नहीं है।

बचत कमजोर हुई तो अगला सहारा क्या?

जुलाई 2026 में सिर्फ 17.8 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि उनकी वित्तीय बचत पिछले एक साल में बढ़ी है। यह भी NABARD के सर्वे में अब तक का सबसे निचला स्तर है।

कमाई स्थिर हो, खर्च बढ़ रहा हो और बचत की गुंजाइश घट रही हो तो परिवार के पास अचानक आने वाले खर्च के लिए विकल्प कम बचते हैं।

यहीं से कर्ज का सवाल सामने आता है।

जुलाई में केवल औपचारिक स्रोतों से कर्ज लेने वाले ग्रामीण परिवारों की हिस्सेदारी 51 फीसदी रही। नवंबर 2025 में यह 58.3 फीसदी थी।

इसके उलट केवल अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज लेने वाले परिवारों की हिस्सेदारी बढ़कर 23.6 फीसदी हो गई। यह NABARD की अब तक की सर्वे श्रृंखला में सबसे ज्यादा है।

इन अनौपचारिक स्रोतों में दोस्त, रिश्तेदार और साहूकार शामिल हैं।

सिर्फ साहूकार को इस पूरी तस्वीर का कारण मान लेना भी ठीक नहीं होगा। सर्वे के मुताबिक 16.2 फीसदी परिवार केवल दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लेते हैं, जबकि 6 फीसदी केवल साहूकारों पर निर्भर हैं।

यानी ग्रामीण कर्ज की कहानी में रिश्तेदारी और निजी उधार भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

महंगाई का दबाव भी ग्रामीण परिवार पर ज्यादा

NABARD का सर्वे जुलाई तक की ग्रामीण स्थिति दिखाता है। इसके बाद उपलब्ध अगस्त के सरकारी आंकड़ों में भी ग्रामीण महंगाई का दबाव बना हुआ दिखा।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार अगस्त 2026 में ग्रामीण CPI महंगाई 5.23 फीसदी रही, जबकि शहरी महंगाई 4.31 फीसदी थी। ग्रामीण खाद्य महंगाई 6.13 फीसदी रही।

जुलाई में ग्रामीण CPI महंगाई 4.84 फीसदी और ग्रामीण खाद्य महंगाई 5.79 फीसदी थी।

इसका मतलब यह नहीं कि हर चीज की कीमत उसी अनुपात में बढ़ी है। अलग-अलग वस्तुओं की कीमतों में अलग-अलग बदलाव हुए हैं। लेकिन ग्रामीण परिवारों के लिए भोजन का खर्च उनके कुल उपभोग में सबसे बड़ा हिस्सा है। इसलिए खाद्य कीमतों का बदलाव सीधे घरेलू बजट पर असर डाल सकता है।

अगस्त के आंकड़ों में प्याज, लहसुन और अदरक जैसी कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज सालाना वृद्धि भी दर्ज हुई।

क्या कृषि ही पूरी कहानी है?

नहीं।

ग्रामीण आय का बड़ा हिस्सा खेती और उससे जुड़े कामों से आता है, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था सिर्फ किसान की आय से नहीं चलती। मजदूरी, छोटे कारोबार, निर्माण, पशुपालन, परिवहन और स्थानीय सेवाएं भी इसमें शामिल हैं।

यही वजह है कि ग्रामीण आय में कमजोरी का कारण किसी एक क्षेत्र को मान लेना जल्दबाजी होगी।

कुछ हालिया विश्लेषणों में ग्रामीण मजदूरी की रफ्तार धीमी पड़ने और कृषि लागत तथा आमदनी के बीच दबाव की बात कही गई है। लेकिन NABARD का सर्वे इन सभी कारणों में से किसी एक को ग्रामीण आय में ठहराव का अकेला कारण साबित नहीं करता।

इसलिए यहां सवाल खुला है—क्या समस्या कम रोजगार की है, कम मजदूरी की, कृषि आय की, लागत बढ़ने की या इन सबके मिश्रण की?

इसका जवाब दूसरे आंकड़ों के साथ देखने पर ही निकलेगा।

गांव की मांग पूरी तरह टूटी भी नहीं है

यहां तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी है।

अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह दबाव में होती तो उपभोग में भी बड़ी गिरावट दिख सकती थी। लेकिन NABARD के जुलाई सर्वे में 74.1 फीसदी परिवारों ने पिछले एक साल में उपभोग खर्च बढ़ने की बात कही।

कुछ दूसरे संकेत भी बताते हैं कि ग्रामीण मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अगस्त में उपलब्ध विश्लेषणों के मुताबिक जुलाई में दोपहिया और ट्रैक्टर बिक्री जैसे कुछ ग्रामीण मांग संकेतकों में वृद्धि बनी हुई थी।

इसलिए “ग्रामीण अर्थव्यवस्था ढह गई” कहना आंकड़ों से आगे निकल जाना होगा।

जो तस्वीर अभी सामने है, वह ज्यादा पेचीदा है।

कमाई की रफ्तार कमजोर है, लेकिन खर्च जारी है।

यही अंतर परिवारों की बचत और कर्ज पर दबाव डाल सकता है।

आगे की उम्मीद भी कमजोर हुई

NABARD के सर्वे में सिर्फ पिछले एक साल की स्थिति नहीं पूछी गई। परिवारों से अगले समय को लेकर उनकी उम्मीद भी जानी गई।

अगले एक साल में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 69.6 फीसदी रही। यह भी सर्वे शुरू होने के बाद सबसे कम स्तर है।

अगले एक साल में आय में बदलाव न होने की उम्मीद रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 23.5 फीसदी और आय घटने की आशंका जताने वालों की हिस्सेदारी 6.9 फीसदी रही।

अगले तीन महीनों में रोजगार की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 39.3 फीसदी थी। आय बढ़ने की उम्मीद रखने वालों का हिस्सा 41.2 फीसदी रहा।

यह भविष्य की गारंटी नहीं है। यह लोगों की उस समय की धारणा है। लेकिन जब पिछली आय का आंकड़ा कमजोर हो और भविष्य की उम्मीद भी नीचे आए, तो इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

सरकार की योजनाएं हैं, लेकिन सवाल आय का है

ग्रामीण परिवारों को सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से सहायता मिलती है। जुलाई के NABARD सर्वे के मुताबिक ग्रामीण परिवारों की मासिक आय में सरकारी सब्सिडी और DBT का औसत योगदान 8.11 फीसदी था।

जनवरी 2025 में यह हिस्सा 10.28 फीसदी बताया गया था।

इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सरकारी सहायता कम होने से ही ग्रामीण आय की रफ्तार घटी है। ऐसे निष्कर्ष के लिए अलग विश्लेषण चाहिए।

लेकिन यह सवाल जरूर सामने आता है कि जब परिवार की नियमित कमाई की रफ्तार धीमी हो तो सरकारी सहायता, रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियां मिलकर कितनी राहत दे पा रही हैं।

असली कहानी 52.6 फीसदी की है

ग्रामीण भारत की मौजूदा तस्वीर को सिर्फ 19.8 फीसदी परिवारों की घटी आय से पढ़ना अधूरा होगा।

सबसे बड़ा आंकड़ा 52.6 फीसदी का है।

इन परिवारों ने कहा कि एक साल में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं हुआ।

महंगाई बढ़ सकती है, खर्च बढ़ सकता है, बच्चों की फीस बढ़ सकती है, खेती की लागत बदल सकती है। लेकिन अगर आय उसी जगह खड़ी रहे तो परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति पर दबाव बनना स्वाभाविक है।

और अगर बचत भी घट रही हो तथा कर्ज का सहारा बढ़ रहा हो, तो दबाव सिर्फ आज की खरीदारी तक सीमित नहीं रहता।

फिलहाल NABARD का सर्वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किसी अंतिम संकट का प्रमाण नहीं है। ग्रामीण मांग में अभी भी मजबूती के संकेत मौजूद हैं। लेकिन आय वृद्धि, बचत और कर्ज से जुड़े आंकड़े एक साथ पढ़ने पर एक साफ सवाल जरूर खड़ा करते हैं—

अगर ग्रामीण परिवार ज्यादा कमा नहीं रहे, लेकिन खर्च लगातार करना पड़ रहा है, तो उनकी आर्थिक मजबूती आखिर बन कैसे रही है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ GDP की वृद्धि दर से नहीं मिलेगा। इसके लिए गांव के परिवार की आय, मजदूरी, खेती की लागत, रोजगार, खाद्य कीमत और कर्ज—इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखना होगा।

स्रोत: NABARD Rural Economic Conditions & Sentiments Survey, जुलाई 2026 · सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, अगस्त 2026 CPI आंकड़े

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