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भारत के IIT-IIM: 'मेरिट' की मीनार, जिसकी नींव में दलित-आदिवासी-OBC कहीं नहीं

 

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डेटा जांच · विशेष रिपोर्ट

भारत के IIT-IIM: 'मेरिट' की मीनार, जिसकी नींव में दलित-आदिवासी-OBC कहीं नहीं

भारत के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी और वैज्ञानिक संस्थानों में SC, ST और OBC समुदायों की स्थिति की RTI दस्तावेज़ों, संसदीय जवाबों और वैज्ञानिक जर्नल के आंकड़ों पर आधारित पड़ताल

0ST/OBC असोसिएट प्रोफेसर, IIT बॉम्बे, 14 वर्ष में
~56%प्रोफेसर पद देश भर में रिक्त (अनुमानित)
171IIT छात्रों की अस्वाभाविक मौत, 20 वर्ष में

महाभारत में एक कथा है — एकलव्य नाम के एक आदिवासी युवक ने धनुर्विद्या सीखने की ज़िद की। गुरु द्रोणाचार्य ने उसे स्वीकार नहीं किया, फिर भी उसने मिट्टी की मूर्ति बनाकर अभ्यास किया और अर्जुन से बेहतर धनुर्धर बन गया। जब द्रोणाचार्य को पता चला, तो उन्होंने गुरु-दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया — ताकि वह कभी अर्जुन से आगे न निकल सके। हज़ारों साल बाद, अंगूठा अब तीर की जगह चयन समिति की मेज़ पर काटा जाता है — नियुक्ति की फ़ाइल में, "Not Found Suitable" के स्टांप में, ख़ाली पड़े आरक्षित पद में।

यह लेख किसी भावना पर नहीं, दस्तावेज़ों पर खड़ा है। हर आंकड़े का स्रोत नीचे दर्ज है। जहां आंकड़ा सरकार का दावा है, वहां उसे दावे के रूप में लिखा गया है। जहां वह allegation है, उसे allegation कहा गया है। और जहां राय है — जैसे इस लेख का शीर्षक ख़ुद — उसे राय के रूप में अलग खंड में रखा गया है।

1. IIT बॉम्बे: 14 साल, एक भी नहीं§ RTI दस्तावेज़

तथ्य — RTI जवाब

Ambedkar Periyar Phule Study Circle (APPSC) नाम के छात्र समूह ने IIT बॉम्बे से RTI के ज़रिए जो जवाब हासिल किया, उसके अनुसार पिछले 14 वर्षों में संस्थान में असोसिएट प्रोफेसर के पद पर एक भी ST उम्मीदवार नियुक्त नहीं हुआ। इसी अवधि में असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर भी शून्य ST नियुक्तियां हुईं, जबकि OBC से 6 और SC से सिर्फ़ 3 उम्मीदवारों को मौक़ा मिला। एक अलग RTI (फ़रवरी 2025) के अनुसार, 2023 में IIT बॉम्बे में एक भी SC, ST या OBC फैकल्टी सदस्य की भर्ती नहीं हुई, और संस्थान के 16 विभागों ने 2023-24 में एक भी ST छात्र को दाख़िला नहीं दिया — पांच विभागों में तो पिछले नौ वर्षों से एक भी ST छात्र दाख़िल नहीं हुआ।

2. देश भर के IIT: एक जैसी तस्वीर§ बहु-स्रोत RTI, 2024–25

तथ्य — बहु-स्रोत RTI विश्लेषण

IIT बॉम्बे कोई अपवाद नहीं है। पिछले दो वर्षों में विभिन्न छात्र संगठनों और शोधकर्ताओं (डॉ. कंचन यादव सहित) द्वारा दाख़िल किए गए RTI आवेदनों से जो चित्र उभरता है, वह लगभग हर पुराने IIT में दोहराया जाता है — जनरल कैटेगरी का भारी बहुमत, और ST प्रतिनिधित्व अक्सर 1% से भी कम, जबकि संवैधानिक कोटा 7.5% है।

IIT फैकल्टी संरचना — श्रेणी अनुसार हिस्सेदारी (%)
स्रोत: विभिन्न संस्थानों की RTI (2024–25) · कोष्ठक में कुल फैकल्टी संख्या
जनरलOBCSCST
IIT खड़गपुर (775 फैकल्टी)
IIT दिल्ली (633 फैकल्टी)
IIT गांधीनगर (135 फैकल्टी)
IIT मंडी (175 फैकल्टी)
IIT जोधपुर (244 फैकल्टी)
IIT पटना (228 फैकल्टी — अपवाद)
संवैधानिक कोटा (संदर्भ रेखा)
27%
15%
7.5%

IIT पटना और IIT इंदौर जैसे कुछ नए, छोटे संस्थान अपवाद हैं जहां प्रतिनिधित्व संवैधानिक कोटे के क़रीब है — निष्पक्षता के लिए यह दर्ज होना ज़रूरी है। लेकिन बड़े, पुराने और सबसे प्रभावशाली IIT (खड़गपुर, दिल्ली, बॉम्बे) में गैप सबसे चौड़ा है।

3. जितनी ऊंची कुर्सी, उतना गहरा सन्नाटा§ Nature जर्नल, 2020

तथ्य — प्रकाशित शोध डेटा

विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका Nature ने 2020 में भारत के 13 शीर्ष संस्थानों से सूचना के अधिकार के तहत डेटा जुटाकर एक विश्लेषण प्रकाशित किया था। इसका सबसे चुभने वाला निष्कर्ष यह है कि प्रतिनिधित्व सिर्फ़ कम नहीं है — यह जितना ऊपर जाओ, उतना ग़ायब होता जाता है।

प्रोफेसर स्तर पर Dalit + Adivasi + OBC की संयुक्त हिस्सेदारी (अनुमानित सीमा)
स्रोत: Nature के प्रकाशित चार्ट (2020) को देखकर लिया गया दृश्य अनुमान — सटीक प्रकाशित संख्या नहीं, इसलिए रेंज में · संवैधानिक कोटा योग संदर्भ रेखा (49.5% = 27+15+7.5)
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR)लगभग शून्य
कोटा-योग 49.5%
टॉप IIT (दिल्ली, बॉम्बे, कानपुर, खड़गपुर)1% से कम
IISc बेंगलुरुलगभग 1–2%
मिड-रैंक IIT (धनबाद, पटना, गुवाहाटी, वाराणसी, गोवा)लगभग 2–3%
JNU (सिर्फ़ Dalit हिस्सा दिखा, वह भी अकेले)लगभग 10–13%
BHU (सभी विभाग)लगभग 14–17%

ज़रूरी स्पष्टीकरण: Nature के मूल लेख में हर बार के आगे सटीक संख्या छापी नहीं गई थी — सिर्फ़ चार्ट दिया गया था। ऊपर के प्रतिशत चार्ट की बार-लंबाई को ध्यान से देखकर लिए गए अनुमान हैं, इसलिए इन्हें अनुमानित सीमा (range) के तौर पर पढ़ें, दशमलव-स्तर के सटीक आंकड़े के तौर पर नहीं। TIFR में एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर भी सिर्फ़ OBC की एक छोटी उपस्थिति दिखी, प्रोफेसर स्तर पर वह भी शून्य के क़रीब पहुंच गई। यह 2020 का डेटा है — इसके बाद कुछ संस्थानों (जैसे JNU, नीचे देखें) में मिशन-मोड भर्ती से सुधार दर्ज हुआ है, इसलिए इसे "आज की तस्वीर" नहीं, "बुनियादी संरचना का सुराग़" समझा जाना चाहिए।

4. जब कुर्सी ही ख़ाली है§ संसदीय समिति, जनवरी 2025

तथ्य — संसदीय समिति रिपोर्ट

राज्यसभा की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, IIT, NIT, IIM, IISER और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्वीकृत क़रीब 18,940 शिक्षण पदों में से 28.56% ख़ाली पड़े थे। यह ख़ालीपन जितना ऊपर जाओ, उतना बढ़ता है:

प्रोफेसर पद रिक्तलगभग 56%
असोसिएट प्रोफेसर पद रिक्तलगभग 38%
असिस्टेंट प्रोफेसर पद रिक्तलगभग 18%
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में OBC आरक्षित पद रिक्तलगभग 41.6%
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ST आरक्षित पद रिक्तलगभग 40.9%
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC आरक्षित पद रिक्तलगभग 34%
सरकार का स्पष्टीकरण

समिति ने इस ख़ालीपन की वजह सेवानिवृत्ति, इस्तीफ़े, बढ़ती छात्र संख्या और धीमी भर्ती प्रक्रिया बताई है। यह सरकार/समिति का स्पष्टीकरण है — तथ्य के तौर पर दर्ज कारण, न कि स्वतंत्र रूप से सत्यापित निष्कर्ष।

तथ्य — लोकसभा जवाब, फ़रवरी 2025

सितंबर 2022 से चलाए गए "मिशन मोड" भर्ती अभियान के तहत दिसंबर 2024 तक IIT-IIM में भरे गए कुल 3,027 पदों में से सिर्फ़ 328 (लगभग 10.8%) SC/ST उम्मीदवारों को मिले — विशेष अभियान के बावजूद अनुपात संवैधानिक कोटे से बहुत नीचे रहा।

5. जो दाख़िला ले भी लिया, वो टिक नहीं पाए§ लोकसभा जवाब, दिसंबर 2023

तथ्य — लोकसभा लिखित जवाब

शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार ने BSP सांसद रितेश पांडे के सवाल के जवाब में बताया कि पिछले पांच वर्षों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IIT और IIM से कुल 13,626 SC/ST/OBC छात्रों ने पढ़ाई बीच में छोड़ी।

संस्थानOBCSCST
केंद्रीय विश्वविद्यालय4,5962,4242,622
IIT2,0661,068408
IIM16318891
सरकार का स्पष्टीकरण

मंत्री ने कहा कि यह "पलायन" मुख्यतः छात्रों द्वारा किसी दूसरे विभाग/संस्थान में बेहतर सीट मिलने या व्यक्तिगत कारणों से होता है। छात्र संगठन इस स्पष्टीकरण को अपर्याप्त मानते हुए कैंपस माहौल को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं। दोनों दावे इस लेख में दर्ज हैं — दोनों में से किसी एक को स्वतः सही नहीं माना गया है, क्योंकि कोई स्वतंत्र, कारण-स्तर की जांच सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

6. कैंपस पर होने वाली मौतें§ हिन्दुस्तान टाइम्स, सितंबर 2026

शोधकर्ता का अनुमान — RTI व मीडिया आधारित

IIT कानपुर के पूर्व छात्र धीरज सिंह द्वारा RTI और मीडिया रिपोर्टों से संकलित डेटा के अनुसार, जनवरी 2006 से सितंबर 2026 के बीच विभिन्न IIT में कम से कम 171 छात्रों की अस्वाभाविक मृत्यु हुई — इनमें से लगभग 82% कैंपस पर हुई आत्महत्याएं थीं। 2016 के बाद के दशक में यह संख्या (120 मौतें) 2006-2015 के दशक (51 मौतें) से 135% ज़्यादा रही।

संस्थानआत्महत्याएं (20 वर्ष)संस्थानआत्महत्याएं
IIT खड़गपुर29IIT भुवनेश्वर5
IIT मद्रास26IIT (ISM) धनबाद4
IIT कानपुर21IIT गांधीनगर3
IIT दिल्ली17IIT रोपड़2
IIT बॉम्बे14IIT मंडी1
IIT गुवाहाटी14IIT जोधपुर1
IIT हैदराबाद9IIT तिरुपति1
IIT रुड़की8IIT धारवाड़1
IIT पटना7IIT गोवा1
IIT (BHU) वाराणसी6IIT इंदौर1

इसी विश्लेषण का अनुमान है कि SC छात्रों की आत्महत्या दर जनरल कैटेगरी की तुलना में लगभग दोगुनी, और कोविड के बाद ST छात्रों में लगभग 4.2 गुना रही। ज़रूरी स्पष्टीकरण: डेटा तैयार करने वाले ने ख़ुद स्वीकार किया है कि यह RTI और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित अनुमान है, जनगणना-स्तर का सत्यापित आंकड़ा नहीं — इसलिए इसे अनुमान के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।

यह विषय संवेदनशील है

अगर आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव से गुज़र रहा है, तो कृपया किसी विश्वसनीय व्यक्ति, काउंसलर या हेल्पलाइन से संपर्क करें। अकेले जूझने की ज़रूरत नहीं है।

7. दूसरा पक्ष — "मैंने कभी भेदभाव होते नहीं देखा"§ विरोधी दृष्टिकोण

विरोधी दृष्टिकोण — सोशल मीडिया पोस्ट

सोशल मीडिया पर IIT बॉम्बे से B.Tech और IIT दिल्ली से PhD करने वाले, और 14 वर्षों से पढ़ा रहे एक प्रोफेसर ने लिखा कि 22 वर्षों में उन्होंने कभी किसी शिक्षक को छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करते नहीं देखा। उनका कहना था कि छात्रों को उनकी जाति का पता ही नहीं चलता था, और सोशल मीडिया ने कमज़ोर छात्रों के मन में "गढ़ी गई शिकायत" (manufactured grievance) भर दी है जो उनके अनुभव में मौजूद नहीं है।

यह एक व्यक्ति की राय और अनुभव है, तथ्य नहीं — लेकिन निष्पक्षता की मांग है कि यह दर्ज हो। ध्यान दें: एक शिक्षक का कक्षा-स्तरीय अनुभव और ऊपर दिए गए भर्ती-पदोन्नति के संरचनात्मक आंकड़े — दोनों अलग-अलग चीज़ें मापते हैं। एक कक्षा में व्यवहार को मापता है, दूसरा चयन समितियों के फ़ैसलों को। दोनों में विरोधाभास होना असंभव नहीं है।

8. संस्थागत माहौल का एक और नमूना§ The Wire, जनवरी 2022

तथ्य — रिपोर्ट किया गया बयान

यह सीधे जातिगत प्रतिनिधित्व से नहीं जुड़ा, लेकिन संस्थागत नेतृत्व और वैज्ञानिक चेतना की गुणवत्ता पर सवाल छोड़ता है। जनवरी 2022 में The Wire की रिपोर्ट के अनुसार, IIT मंडी के तत्कालीन निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि उन्होंने "बुरी आत्माओं को भगाया" है और भूत-प्रेत असल में मौजूद हैं, क्योंकि "आधुनिक विज्ञान कई घटनाओं की व्याख्या नहीं कर पाता।" इस बयान पर संस्थान के भीतर और बाहर विवाद हुआ था।

यह प्रसंग इस लेख में सिर्फ़ इसलिए शामिल है क्योंकि यह उस बड़े तर्क की जांच करता है जो अक्सर सुना जाता है — कि IIT जैसी संस्थाएं सिर्फ़ "वैज्ञानिक मेरिट" के आधार पर चलती हैं, इसलिए वहां सामाजिक न्याय की बहस ग़ैर-ज़रूरी है। जब संस्थान के शीर्ष नेतृत्व से ही ऐसे बयान आते हैं, तो "मेरिट बनाम आरक्षण" की सरल बाइनरी ख़ुद सवालों के घेरे में आ जाती है।

9. दुनिया से मुक़ाबले में यही "मेरिट" कहां है?§ Nature Index / QS एशिया 2026

तथ्य — रैंकिंग डेटा

Nature Index 2026 (शोध-आउटपुट आधारित रैंकिंग) में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु वैश्विक स्तर पर 202वें और IIT बॉम्बे 281वें स्थान पर है। यह रैंकिंग सीधे जातिगत प्रतिनिधित्व से नहीं जुड़ी — यह उद्धरण, सहयोग और शोध-आउटपुट जैसे मानकों पर आधारित है, इसलिए इसे कारण-प्रभाव नहीं, संदर्भ के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए।

वैश्विक रैंकिंग में स्थिति (कम अंक = बेहतर स्थान)
IISc बेंगलुरु — Nature Index 2026#202
IIT बॉम्बे — Nature Index 2026#281
IIT दिल्ली — QS Asia 2026 (2025: #44)#59
IIT बॉम्बे — QS Asia 2026 (2025: #48)#71

पैमाना: bar जितना छोटा, रैंक उतनी बेहतर (चूंकि कम नंबर = ऊंचा स्थान)। तुलना के लिए: शीर्ष 100 Nature Index संस्थानों में सर्वाधिक हिस्सेदारी चीन के संस्थानों की है।

10. क़ानून क्या कहता है§ पृष्ठभूमि


संपादकीय — यह राय है, तथ्य नहीं§ The Point Blank का नज़रिया

राय / संपादकीय टिप्पणी

ऊपर के हर आंकड़े को अलग-अलग पढ़ें, तो वे "व्यवस्थागत देरी" लग सकते हैं। लेकिन इन्हें एक साथ रखकर देखिए — भर्ती में शून्य, पदोन्नति में शून्य के क़रीब, ख़ाली पड़े पद सबसे ज़्यादा ठीक उन्हीं श्रेणियों में, और जो दाख़िला ले भी लें, वो टिक नहीं पाते। यह इत्तेफ़ाक़ नहीं, पैटर्न है।

महाभारत का द्रोणाचार्य कम से कम ईमानदार था — उसने खुलकर अंगूठा मांगा। आज के द्रोणाचार्य ज़्यादा चालाक हैं। वे अंगूठा नहीं मांगते, वे सिर्फ़ "उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला" लिख देते हैं। वे भेदभाव नहीं करते, वे सिर्फ़ "फ्लेक्सिबल कैडर" की आड़ ले लेते हैं। नतीजा वही है — एकलव्य आज भी धनुष उठाने से पहले अपना अंगूठा गंवा देता है, बस अब इसे "मेरिट" का नाम दे दिया गया है।

यह सवाल किसी एक सरकार, एक पार्टी या एक संस्थान तक सीमित नहीं है — यह डेटा दिखाता है कि यह पैटर्न दशकों से, अलग-अलग सरकारों के दौर में लगातार चला है। हां, विपक्ष के कुछ नेताओं ने इसे सीधे मौजूदा सरकार पर हमले की भाषा में भी उठाया है — जैसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में पेश आंकड़ों को "संस्थागत मनुवादी भेदभाव" बताया था। यह उनका राजनीतिक आरोप है, इस लेख का तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं। लेकिन आरोप को ग़लत साबित करने का बोझ भी उन्हीं संस्थानों पर है, जिनके पास दशकों से यह डेटा मौजूद है और सुधार की रफ़्तार अब भी घोंघे जैसी है।

जो लोग कहते हैं कि "यहां सिर्फ़ मेरिट चलती है", उनसे एक सीधा सवाल है — फिर वही मेरिट दुनिया की रैंकिंग में चीन के दर्जनों संस्थानों से पीछे क्यों खड़ी मिलती है? नौकरी और प्रमोशन के समय दिखने वाली यह मेरिट, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मैदान में अचानक कमज़ोर क्यों पड़ जाती है? जवाब शायद यह है कि जिस व्यवस्था ने आधी आबादी की प्रतिभा को दशकों तक दरवाज़े पर ही रोक रखा हो, वह अपनी पूरी क्षमता से कभी दौड़ ही नहीं सकती — अंगूठा कटा हाथ धनुष कैसे उठाएगा?


निष्कर्ष: वे सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं

  • क्या 27%-15%-7.5% का संवैधानिक कोटा सिर्फ़ काग़ज़ पर एक संख्या बनकर रह गया है?
  • "Not Found Suitable" जैसी श्रेणियों का स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं होता — कितनी बार यह वास्तविक योग्यता की कमी है, कितनी बार संस्थागत अनिच्छा?
  • अगर ड्रॉपआउट सच में "स्वैच्छिक स्थानांतरण" है, तो इसका विभाजन SC/ST/OBC बनाम जनरल में इतना असंतुलित क्यों है?
  • वरिष्ठ पदों पर प्रतिनिधित्व कनिष्ठ पदों से इतना कम क्यों होता जाता है — भर्ती की समस्या है, या टिके रहने और पदोन्नति की?
  • क्या "फ्लेक्सिबल कैडर" जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शिता बढ़ाती हैं, या जवाबदेही से बचने का एक वैध रास्ता बन गई हैं?
  • जब JNU जैसी जगह मिशन-मोड भर्ती से बदलाव ला सकती है, तो यही इच्छाशक्ति हर IIT, हर IIM में हर साल क्यों नहीं दिखती?

संबंधित रिपोर्ट — The Point Blank

इसी संस्थान पर हमारी पहले की गहन पड़ताल भी पढ़ें — "IIT बॉम्बे में एक मौत, अधूरे जवाब — दर्शन सोलंकी केस, आँकड़े और संस्थागत जवाबदेही का सवाल", जिसमें एक अकेले केस की पूरी कानूनी और संस्थागत समयरेखा दर्ज है — जबकि यह लेख उसी पैटर्न की देशव्यापी, संरचनात्मक तस्वीर दिखाता है।


स्रोत सूची

  • Ambedkar Periyar Phule Study Circle (APPSC), IIT बॉम्बे — RTI जवाब, 2024–25
  • The Mooknayak, Feminism in India, Careers360 — विभिन्न IIT की RTI-आधारित फैकल्टी डेटा रिपोर्टें (2024–25)
  • Nature, "Faculty members in India" — सूचना के अधिकार अनुरोध आधारित विश्लेषण, 2020
  • राज्यसभा शिक्षा संबंधी स्थायी समिति रिपोर्ट, "2025-26 डिमांड्स फॉर ग्रांट्स", जनवरी 2025 तक डेटा
  • लोकसभा लिखित जवाब — शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार, दिसंबर 2023 (प्रश्नकर्ता: रितेश पांडे, BSP)
  • लोकसभा लिखित जवाब — शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार, फ़रवरी 2025 (मिशन मोड भर्ती आंकड़े)
  • हिन्दुस्तान टाइम्स — "171 IIT students died unnatural deaths in 20 years", सितंबर 2026
  • The Wire — "IIT Mandi Director Claims to 'Have Driven Out Evil Spirits'", जनवरी 2022
  • Nature Index Research Leaders 2026; QS Asia University Rankings 2026
  • Careers360 — "In a first, JNU appoints professors from ST category", सितंबर 2023
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 — संशोधित संस्करण, 2018
THE POINT BLANK OFFICIAL
UNBIASED. FEARLESS. TO THE POINT.

यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध RTI दस्तावेज़ों, संसदीय रिकॉर्ड और प्रकाशित शोध पर आधारित है। जहां जानकारी allegation, अनुमान या राय है, वहां स्पष्ट रूप से चिह्नित किया गया है। तथ्यात्मक त्रुटि की स्थिति में सुधार हेतु संपर्क करें।

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