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बालाघाट के जंगलों में दफ्न बच्चे: कैसे दो महीने तक किसी को खबर ही नहीं हुई?

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बालाघाट के जंगलों में दफ्न बच्चे: कैसे दो महीने तक किसी को खबर ही नहीं हुई?


मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा और गोंड आदिवासी गांवों में मई 2026 से अब तक 25 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है — कुछ स्थानीय नेता और रिपोर्टें यह आंकड़ा 29 से 30 के पार भी बताती हैं। मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में है, अगली सुनवाई 18 सितंबर को है। हमने अदालत के दस्तावेज़ों, सरकारी बयानों और ज़मीनी रिपोर्टिंग को खंगाला — यह रहा पूरा सच, बिना सनसनी के।



एक बच्ची जिसका वज़न सिर्फ़ 4 किलो था

13 अगस्त 2026 को जब प्रियंका की मौत हुई, तो उसका वज़न सिर्फ़ चार किलो था। सरकारी दस्तावेज़ों में उसकी मौत का कारण दर्ज है — गंभीर कुपोषण, सांस लेने में गंभीर तकलीफ़, गंभीर एनीमिया और शॉक।

इससे कुछ हफ़्ते पहले, जून में, बोंडरी गांव में एक साल के साहिल को तेज़ बुखार और शरीर पर दाने निकले। एक महीने के भीतर उसकी मौत हो गई। अगले ही दिन उसकी 12 साल की बहन लामनिन भी वैसे ही लक्षणों के साथ घर पर दम तोड़ गई। मटला गांव में महासिंह परते नाम के एक बैगा आदिवासी ने मई में अपने चार साल के बेटे समलू और छह साल की बेटी शामकू — दोनों को कुछ ही दिनों के अंतराल में खो दिया।

यह मौतें उस सिलसिले की शुरुआती कड़ियां हैं, जिसे अब विशेषज्ञ खसरा-मलेरिया आउटब्रेक बता रहे हैं — एक ऐसी बीमारी जो लगभग दो महीने तक बालाघाट के दूरदराज़ आदिवासी इलाक़े में बिना किसी की नज़र में आए फैलती रही।

संख्या को लेकर भ्रम क्यों है — और यह ईमानदारी से बताना क्यों ज़रूरी है

ज़िम्मेदार पत्रकारिता का तक़ाज़ा है कि हम एक आंकड़े को "अंतिम सच" बताकर पेश न करें। इस मामले में चार अलग-अलग संख्याएं सामने आई हैं, और हर एक का स्रोत अलग है:

ज़िला प्रशासन के आधिकारिक रिकॉर्ड जून 2026 से अब तक 8 मौतों को सीधे मौसमी बीमारियों (मलेरिया-खसरा) से जोड़ते हैं, बाक़ी को असंबद्ध या अलग कारणों से हुई बताया गया है।

एक कांग्रेस विधायक और स्थानीय आदिवासी प्रतिनिधियों ने बिरसा ब्लॉक में 29 मौतों का दावा किया।

हाईकोर्ट में दाख़िल जनहित याचिका में "30 से अधिक बच्चों" की मौत का ज़िक्र है, जो अख़बार द पायनियर की 30 अगस्त की रिपोर्ट पर आधारित थी।

स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा खंगाले गए सरकारी रिकॉर्ड 25 मौतों की पुष्टि करते हैं।

फ़र्क़ इसलिए है क्योंकि हर पक्ष अलग समय-सीमा, अलग गांवों और अलग परिभाषा का इस्तेमाल कर रहा है। इसीलिए हम यह नहीं लिखेंगे कि "फ़लां संख्या पक्की है" — 

बल्कि यह बताएंगे कि कौन सी संख्या किस स्रोत से आ रही है। सच को सनसनी से ज़्यादा अहमियत मिलनी चाहिए।

आख़िर मरे किस चीज़ से?
याचिका और सरकारी समीक्षा दोनों में एक जैसी बात सामने आती है — यह किसी एक बीमारी की कहानी नहीं है। दर्ज कारणों में शामिल हैं: खसरा, मलेरिया (जिसमें ख़तरनाक फ़ैल्सिपेरम मलेरिया भी शामिल है), 

तेज़ बुखार, खाज-खुजली, गंभीर कुपोषण, एनीमिया, सांस की तकलीफ़, डिहाइड्रेशन और शॉक।

बिथली गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जुलाई से अब तक भर्ती हुए क़रीब 150 बच्चों में से 50 से ज़्यादा कम वज़न के पाए गए — यह जानकारी वहां तैनात एक चिकित्सा अधिकारी ने साझा की। उनका कहना था कि कुपोषित बच्चों का शरीर मामूली संक्रमण से भी उबर नहीं पाता। एक जाने-माने वायरोलॉजिस्ट ने भी इसी बात की पुष्टि की — मलेरिया शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर देता है, और कुपोषण पहले से मौजूद बीमारी को और गंभीर बना देता है।

दो महीने तक किसी को पता क्यों नहीं चला?

बालाघाट का प्रभावित इलाक़ा — बिरसा और बैहर ब्लॉक — कान्हा नेशनल पार्क से सटा घना जंगली क्षेत्र है, जहां बैगा जनजाति (PVTG दर्जा प्राप्त) और गोंड समुदाय के परिवार रहते हैं। मटला जैसे गांव तक पहुंचने के लिए पहाड़ी और फिसलन भरे कच्चे रास्तों पर एक किलोमीटर से ज़्यादा पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।

ज़मीनी रिपोर्टों में एक स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को लेकर दावा किया गया है कि उसे अपने गांव में हो रही मौतों की जानकारी थी, लेकिन इसकी रिपोर्ट ऊपर तक नहीं पहुंचाई गई। स्वास्थ्य विभाग ने कथित तौर पर नौवीं मौत के बाद, यानी 22 जुलाई के आसपास, सक्रिय क़दम उठाने शुरू किए।

इस देरी की एक बड़ी वजह स्टाफ़ की भारी कमी भी है — बालाघाट ज़िले में आशा कार्यकर्ताओं के 72 पद ख़ाली थे, जिनमें से अकेले बिरसा ब्लॉक में 48 पद रिक्त थे।

एक पिता ने, जिसने अपने दो बच्चे इस बीमारी में खोए, स्वास्थ्य टीम के पहुंचने पर सिर्फ़ इतना कहा — कि मदद अब आई है, जब उसके बच्चे जा चुके हैं।

अदालत में क्या हुआ अब तक

याचिकाकर्ता: नरसिंहपुर निवासी अंशुल तिवारी (WP No. 35919/2026)।

बेंच: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रुसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल, जबलपुर।

3 सितंबर: अदालत ने याचिकाकर्ता को ख़ुद गांवों में जाकर हलफ़नामा दाख़िल करने का निर्देश दिया।

9 सितंबर का हलफ़नामा: हैंडपंपों से पीला पानी, महीनों से पौष्टिक आहार न मिलना, गंदगी संक्रमण की वजह।
50 बेड पर 400 मरीज़ होने का दावा याचिका में दर्ज।

नोटिस: स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट कलेक्टर को जवाब का निर्देश।

अगली सुनवाई: 18 सितंबर 2026।

सरकार की तरफ़ से भी जुलाई के बाद सक्रियता बढ़ी — सक्रिय मरीज़-खोज अभियान, समय पर रेफ़रल, प्रकोप-रोधी टीकाकरण, विटामिन-ए सप्लीमेंटेशन, मच्छर-नियंत्रण और सुरक्षित पेयजल से जुड़े क़दम उठाए गए। सितंबर की शुरुआत तक दावा था कि पिछले सात दिनों में खसरे का कोई नया मामला सामने नहीं आया। सवाल यह नहीं कि अब कुछ नहीं हो रहा — सवाल यह है कि यह सब दर्जनों बच्चों की मौत के बाद क्यों शुरू हुआ।

भाग दो: बालाघाट कोई अपवाद नहीं — यह पूरे देश की तस्वीर का एक फ़्रेम है

जब मौत का सर्टिफ़िकेट कभी "भूख" नहीं लिखता
भारत में सरकारी दस्तावेज़ों में शायद ही कभी किसी की मौत का कारण सीधे "भूख से मौत" दर्ज किया जाता है। बालाघाट में भी बच्चों की मौत "गंभीर कुपोषण, एनीमिया, शॉक" जैसे मेडिकल शब्दों में दर्ज हुई, "भूख" शब्द में नहीं। नतीजा — भूख असल ज़िंदगी में मौजूद रहती है, लेकिन सरकारी काग़ज़ पर लगभग अदृश्य हो जाती है।

नंबर जो बताते हैं कि समस्या कितनी बड़ी है

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025: भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर, स्कोर 25.8 — "गंभीर" श्रेणी। (भारत सरकार इस इंडेक्स की गणना-पद्धति पर हर साल आपत्ति दर्ज कराती है।)

NFHS-5 (2019-21): पांच साल से कम उम्र के 36% बच्चे स्टंटेड।

अनुसूचित जाति के बच्चों में स्टंटिंग 39.2%, अनुसूचित जनजाति में 40.9% — वेस्टिंग सबसे ज़्यादा ST बच्चों में।

ग्रामीण भारत में 26% आबादी बहुआयामी ग़रीबी में — आय के अलावा पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा में भी पिछड़ी।

बालाघाट में NFHS-6 के अनुसार पांच साल से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा कम वज़न का — यानी खसरा-मलेरिया पहुंचने से पहले ही ज़मीन तैयार थी।

भूख जाति नहीं देखती, लेकिन व्यवस्था तक पहुंच देखती है

भूख और ग़रीबी किसी की जाति पूछकर नहीं आती। एक सामान्य वर्ग का दिहाड़ी मज़दूर, एक पिछड़े वर्ग का छोटा किसान, एक दलित परिवार, या बालाघाट जैसे किसी आदिवासी गांव का बच्चा — सबकी लड़ाई एक जैसी है: अगली रोटी कहां से आएगी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि जिस परिवार के पास ज़मीन नहीं, स्वास्थ्य केंद्र दूर है, सड़क नहीं है — वहां यह लड़ाई कहीं ज़्यादा लंबी और ख़तरनाक हो जाती है। यह किसी समुदाय की "प्रकृति" नहीं, दशकों की दूरी और अनदेखी का नतीजा है।

यह पैटर्न बालाघाट तक सीमित नहीं — महाराष्ट्र के मेलघाट आदिवासी क्षेत्र में भी बाल और मातृ मृत्यु को लेकर अदालतें लगातार राज्य सरकार को फटकार लगाती रही हैं।

भाग तीन: प्रशासन कहां है?

यह सवाल किसी एक सरकार या पार्टी पर हमला नहीं — यह हर दौर की, हर स्तर की व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए वाला सवाल है। सवाल योजनाओं की कमी का नहीं है — पोषण अभियान, आंगनवाड़ी नेटवर्क, राशन व्यवस्था सब काग़ज़ पर मौजूद हैं। सवाल यह है:

जो योजना दिल्ली या भोपाल के दफ़्तर में बनती है, वह उस आख़िरी गांव तक पहुंचती क्यों नहीं जहां सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?

भाग चार: चांद और गांव — एक ही देश की दो सच्चाइयां

विज्ञान, तकनीक और आत्मनिर्भरता में तरक़्क़ी हर देश के लिए ज़रूरी है, और भारत की उपलब्धियां वाजिब गर्व की बात हैं। लेकिन एक परिपक्व समाज वह है जो एक साथ दो बातें कह सके:

"हमें चांद पर जाने पर गर्व है — और हमें यह भी मानना होगा कि हमारे ही किसी गांव में एक बच्चा भूख और कुपोषण से बीमार होकर मर रहा है, यह क़बूल करने लायक़ बात नहीं है।"

यह दोनों बातें एक-दूसरे को झुठलाती नहीं — बल्कि यह दिखाती हैं कि तरक़्क़ी का फल अभी तक हर हाथ तक बराबर नहीं पहुंचा।

पाठकों के सबसे आम सवाल

क्या बालाघाट में बच्चे सिर्फ़ भूख से मरे?

नहीं, सीधे तौर पर नहीं। दर्ज कारण खसरा, मलेरिया, कुपोषण, एनीमिया और गंदे पानी का मिला-जुला असर हैं। लेकिन कुपोषण ने इन बीमारियों को कहीं ज़्यादा जानलेवा बना दिया।

क्या यह सिर्फ़ आदिवासी समुदाय की समस्या है?

कुपोषण और ग़रीबी हर जाति-वर्ग में मौजूद है, लेकिन इसका बोझ बराबर नहीं बंटा — अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के परिवारों पर यह बोझ सबसे भारी है, इसके बाद पिछड़ा वर्ग, फिर सामान्य वर्ग का सबसे ग़रीब तबक़ा।

क्या सरकार कुछ नहीं कर रही?
कर रही है — पोषण अभियान, आंगनवाड़ी नेटवर्क, टीकाकरण मिशन मौजूद हैं, और बालाघाट में जुलाई के बाद सक्रियता भी बढ़ी है। सवाल नीयत का नहीं, समय पर आख़िरी गांव तक पहुंचने का है।

अब आगे क्या होगा?

18 सितंबर की सुनवाई में राज्य सरकार को अपना जवाब और दैनिक सर्वे रिपोर्ट अदालत में पेश करनी है।

तो होना क्या चाहिए?
मौत के हर मामले में असली कारण दर्ज हो — सिर्फ़ "बीमारी" नहीं, बल्कि यह भी कि क्या कुपोषण, ग़रीबी या स्वास्थ्य-सुविधा की कमी उस मौत का हिस्सा थी।

दूरदराज़ इलाक़ों में स्वास्थ्य और पोषण अमला पहले भरा जाए, बाद में नहीं।

जवाबदेही तय हो — चूक से जान गई तो सिर्फ़ माफ़ी नहीं, ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए।

नागरिक के तौर पर सवाल पूछते रहना — यही लोकतंत्र में बदलाव की शुरुआत है।
आख़िर में
बालाघाट की यह घटना सिर्फ़ मौतों की गिनती का मामला नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि जिस देश में खसरे का टीका चार दशक पुराना है, वहां जंगल के भीतर बसे कुछ गांवों तक वह टीका, वह डॉक्टर, वह साफ़ पानी पहुंचने में इतनी देर क्यों लगी।

चांद पर झंडा गाड़ना आसान साबित हुआ। ज़मीन पर हर बच्चे की थाली तक, हर गांव के हैंडपंप तक साफ़ पानी पहुंचाना — वह असली चुनौती अभी बाक़ी है।


आख़िर में

बालाघाट की यह घटना सिर्फ़ मौतों की गिनती का मामला नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि जिस देश में खसरे का टीका चार दशक पुराना है, वहां जंगल के भीतर बसे कुछ गांवों तक वह टीका, वह डॉक्टर, वह साफ़ पानी पहुंचने में इतनी देर क्यों लगी।

जब तक पूरी जांच पूरी नहीं होती और अदालत में सारे तथ्य सामने नहीं आते, तब तक ज़िम्मेदार पत्रकारिता का काम है — सही तथ्य, सही स्रोत के साथ पेश करना, न कि किसी एक आंकड़े को अंतिम सच मान लेना।

रिपोर्ट स्रोत: LiveLaw, PTI/The Print, Scroll.in, LawBeat, Daily Pioneer, ANI, Law Trend, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर बेंच रिकॉर्ड (WP No. 35919/2026), Global Hunger Index 2025 (Concern Worldwide व Welthungerhilfe), National Family Health Survey-5 (2019–21), जातिगत पोषण-असमानता पर प्रकाशित शोध (NCBI/PMC)। जहां आंकड़ों में अंतर या असहमति है, उसे लेख में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है।

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