BRICS 2026: दिल्ली में सिर्फ शिखर सम्मेलन नहीं, शक्ति-संतुलन की नई पटकथा लिखी गई?
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BRICS 2026: दिल्ली में सिर्फ शिखर सम्मेलन नहीं, शक्ति-संतुलन की नई पटकथा लिखी गई?
BRICS 2026 Summit: दिल्ली में क्या हुआ, भारत और दुनिया को क्या मिला? क्या दिल्ली से बदल रही है दुनिया की दिशा?
यह सम्मेलन ऐसे वक्त पर हुआ जब पश्चिम एशिया युद्ध की चपेट में है, टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को हिला रहे हैं, और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद ही बदलती जा रही है। भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही थी—क्या इतने अलग-अलग हितों और मजबूरियों वाले देश आखिर एक साझा भाषा बोल पाएंगे?
जवाब पूरी तरह हां तो नहीं है, लेकिन पहले से कहीं ज्यादा साफ ज़रूर है। BRICS देशों ने New Delhi Declaration को अपनाया, जिसमें वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों की बड़ी भागीदारी, संयुक्त राष्ट्र में सुधार, व्यापार में एकतरफा बाधाओं पर चिंता, स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन, सीमा-पार भुगतान, और AI, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष व विज्ञान-तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। लेकिन इसे सिर्फ "BRICS की जीत" कह देना उतना ही अधूरा होगा, जितना इसे महज़ एक औपचारिक सम्मेलन मान लेना। असली कहानी इन दोनों छोरों के बीच कहीं दबी है।
आज BRICS में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और UAE समेत कुल 11 सदस्य देश हैं। विस्तार के बाद संगठन का भूगोल भी बदला है और राजनीतिक वज़न भी। Reuters की रिपोर्टिंग के मुताबिक BRICS अब दुनिया की 40% से ज्यादा आबादी को अपने भीतर समेटता है, और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी भी उसी अनुपात में बड़ी है। यानी यह अब उन चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं का पुराना विचार नहीं रह गया—यह धीरे-धीरे एक ऐसे मंच में बदल रहा है जहां एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका की आवाज़ें एक साथ बैठती हैं।
यह भारत के लिए खासतौर पर मायने रखता है। भारत लंबे अरसे से UN Security Council की स्थायी सदस्यता की अपनी दावेदारी रखता आया है, और BRICS मंच से developing countries के प्रतिनिधित्व को लेकर बनी सहमति उस कूटनीतिक कोशिश को एक तरह का राजनीतिक समर्थन देती है। हालांकि यहां एक बात साफ समझ लेनी चाहिए—BRICS Declaration का समर्थन मिलना भारत को स्थायी सीट मिल जाने के बराबर नहीं है। यह एक कूटनीतिक फायदा है, अंतिम नतीजा नहीं।
BRICS ने पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा पर गहरी चिंता जताते हुए maximum restraint, नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता के सम्मान और बातचीत-कूटनीति के ज़रिए विवादों के हल पर ज़ोर दिया। Reuters के मुताबिक ईरान और UAE, दोनों ने इस संयुक्त BRICS बयान का समर्थन किया, और यहीं भारत की भूमिका भी उभरकर सामने आती है।
भारत ने इस मंच को किसी एक पक्ष के समर्थन का ज़रिया बनाने के बजाय de-escalation और संवाद की भाषा में बांधे रखने की कोशिश की। दिल्ली का संदेश साफ था—BRICS किसी एक युद्ध का पक्षकार बनने से ज्यादा, ऐसी वैश्विक व्यवस्था चाहता है जिसमें युद्धों को थामने के कूटनीतिक रास्ते मज़बूत हों।
इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि BRICS ने कोई साझा मुद्रा लॉन्च कर दी हो। न तो कोई तत्काल "BRICS currency" सामने आई है, न डॉलर व्यवस्था कल ही खत्म होने वाली है। असल बदलाव इससे कहीं धीमी रफ्तार से होगा।
अगर अलग-अलग देश अपने व्यापार का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे स्थानीय मुद्राओं में करने लगें और भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ें, तो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर पूर्ण निर्भरता कुछ हद तक ज़रूर घट सकती है। यही वह बदलाव है जिस पर नज़र रखनी चाहिए—फिलहाल BRICS का लक्ष्य डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि विकल्पों की संख्या बढ़ाना ज्यादा दिखता है।
भारत ने अपनी तरफ से Digital Public Infrastructure से जुड़ा एक repository initiative, health training hub network और industrial competencies से जुड़े प्रस्ताव आगे बढ़ाए। अंतरिक्ष क्षेत्र में BRICS Remote Sensing Satellite Constellation और साझा science-research सहयोग को भी गति दी गई।
यह बदलाव इसलिए मायने रखता है क्योंकि आने वाली दुनिया में शक्ति सिर्फ सैन्य क्षमता से तय नहीं होगी—जिसके पास data होगा, AI होगा, semiconductor technology होगी, space infrastructure और digital public infrastructure होगा, उसी के पास वैश्विक प्रभाव की नई भाषा होगी। भारत खुद को इस भाषा में सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता के तौर पर स्थापित करना चाहता है।
यहां थोड़ी सावधानी ज़रूरी है। एक मुलाकात से भारत-चीन संबंध रातों-रात सामान्य नहीं हो गए। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, market access और strategic competition जैसे मुद्दे अभी भी वहीं मौजूद हैं। लेकिन कूटनीति में कई बार उपलब्धि किसी बड़े समझौते में नहीं, बल्कि सिर्फ इसमें होती है कि बातचीत फिर से शुरू हो जाए। दिल्ली में यही हुआ भी।
इसलिए BRICS में भारत की कोशिश किसी एक खेमे के साथ खड़े होने की नहीं थी, बल्कि अलग-अलग ध्रुवों के बीच एक संवाद का पुल बनाने की थी। ईरान और UAE के बीच BRICS के साझा बयान पर सहमति बनना, और पश्चिम एशिया पर restraint की भाषा अपनाना, इसी कोशिश की एक मिसाल है। शायद यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत भी है—एक ही समय पर कई राजधानियों से बात करने की क्षमता।
चौथा फायदा टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी का है। AI, digital public infrastructure, अंतरिक्ष, quantum technology और health cooperation जैसे क्षेत्रों में भारत के पास अपनी क्षमता को बाकी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तक ले जाने का मौका है। और पांचवां, शायद सबसे बड़ा फायदा—strategic autonomy। भारत किसी एक power bloc पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन, ईरान, UAE और Global South, सबके साथ अलग-अलग स्तर पर रिश्ते बनाए रखना चाहता है, और BRICS इस रणनीति के लिए एक अहम मंच साबित हो रहा है।
लेकिन यहां एक बड़ी सीमा भी है। BRICS सदस्य देशों की विदेश नीतियां एक जैसी नहीं हैं—भारत-चीन के बीच प्रतिस्पर्धा है, ईरान-UAE के बीच गंभीर क्षेत्रीय तनाव हैं, और रूस-पश्चिम के बीच संघर्ष जारी है। इसलिए BRICS का भविष्य इसी पर टिका है कि वह इन मतभेदों के बावजूद कितने व्यावहारिक मुद्दों पर मिलकर काम कर पाता है।
BRICS न NATO है, न European Union। इसके पास कोई साझा सैन्य कमान नहीं है, कोई एकीकृत विदेश नीति नहीं है, और न हर मुद्दे पर एक जैसी सोच। इसलिए इसे "नई विश्व सरकार" कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इसे सिर्फ "बातचीत का मंच" कह देना भी अब काफी नहीं लगता। यह धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था गढ़ने की कोशिश में है जहां Global South सिर्फ नियम मानने वाला पक्ष न रहे, बल्कि नियम बनाने की मेज पर भी उसकी जगह हो।
पहला सवाल यह है कि घोषणा और अमल के बीच का फासला कितना बड़ा है। BRICS हर साल एक विस्तृत घोषणापत्र जारी करता है, लेकिन पिछले वर्षों की कई प्रतिबद्धताएं—चाहे वह local currency trade हो या payment interoperability—अब भी शुरुआती चरण में ही हैं। सवाल यह नहीं कि नीयत क्या है, सवाल यह है कि क्रियान्वयन की रफ्तार क्यों इतनी धीमी रहती है।
दूसरा सवाल भारत की अपनी स्थिति से जुड़ा है। भारत एक तरफ BRICS को "anti-West platform" न बनने देने की बात करता है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी गहरी करता जा रहा है। क्या यह संतुलन असल कूटनीतिक कुशलता है, या यह सिर्फ इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि BRICS में अभी कोई बाध्यकारी संस्थागत ढांचा ही नहीं है जो सदस्य देशों को किसी एक पक्ष चुनने पर मजबूर करे?
तीसरा, चीन का वज़न। BRICS के भीतर आर्थिक आकार और प्रभाव में चीन बाकी सदस्यों से कहीं आगे है। ऐसे में जब घोषणा "sovereign equality" और "multipolar world" की बात करती है, तो यह पूछना जायज़ है कि क्या BRICS खुद अपने भीतर एक तरह की असमानता को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहा। भारत-चीन सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे मंच की साझा भाषा में कहीं गुम हो जाते हैं।
चौथा, मानवाधिकार और घरेलू राजनीति पर चुप्पी। पश्चिम एशिया पर BRICS ने de-escalation की भाषा तो अपनाई, लेकिन सदस्य देशों के भीतर की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों पर यह मंच लगभग खामोश रहता है। आलोचक यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या BRICS सच में एक नई, ज्यादा जवाबदेह विश्व-व्यवस्था गढ़ रहा है, या यह सिर्फ मौजूदा सत्ताधारी वर्गों के लिए एक और मंच भर है जहां आपसी असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते।
और पांचवां, स्थायित्व का सवाल। BRICS के पास न कोई सचिवालय जैसा मज़बूत ढांचा है, न कोई बाध्यकारी विवाद-निपटान तंत्र। इसका मतलब है कि हर घोषणा, हर सहमति काफी हद तक राजनीतिक इच्छाशक्ति पर टिकी है—और इच्छाशक्ति सरकारें बदलने के साथ बदल भी सकती है। दिल्ली में जो सहमति बनी, क्या वह अगले सम्मेलन तक भी उतनी ही मजबूत रहेगी, यह अभी कहना मुश्किल है।
और इन सबके बीचोंबीच भारत खड़ा है। भारत के लिए चुनौती भी यही है—BRICS में नेतृत्व करना अपेक्षाकृत आसान है, मगर भारत-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम संघर्ष और पश्चिम एशिया के संकट के बीच संतुलन बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है। दिल्ली सम्मेलन में भारत ने कम से कम इतना ज़रूर दिखा दिया कि वह इस मुश्किल संतुलन से पीछे हटने वाला नहीं है।
भारत के लिए दिल्ली सम्मेलन एक मौका भी है और एक इम्तिहान भी। मौका इसलिए कि भारत आज कई विरोधी ध्रुवों के बीच संवाद करने की क्षमता रखता है। इम्तिहान इसलिए कि इस कूटनीतिक पूंजी को असली आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक फायदे में बदलना अब भारत की अगली ज़िम्मेदारी है।
दिल्ली BRICS का अंत नहीं थी। यह उस बदलती दुनिया की एक और साफ तस्वीर थी, जिसमें Global South अपनी जगह मांग नहीं रहा—बल्कि उसे ज्यादा मज़बूती से खुद परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। और शायद यही इस पूरे सम्मेलन की सबसे अहम कहानी है। भारत अब सिर्फ उस मेज पर बैठा देश भर नहीं है जहां दुनिया के नियमों पर बहस होती है—भारत उस मेज की भाषा को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। यही BRICS 2026 की असली कहानी है।
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