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विकास की दौड़ में पर्यावरण की बलि कब तक?

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विकास की दौड़ में पर्यावरण की बलि कब तक?

भारत के जंगल, जलवायु और वन्यजीवों का पूरा लेखा-जोखा — आंकड़ों, शोध और ज़मीनी हकीकत के साथ



भारत आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ़ सड़कें, बंदरगाह, खदानें और बिजलीघर बनाने की रफ़्तार अभूतपूर्व है, तो दूसरी तरफ़ जंगल, नदियां और वन्यजीव लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य से लेकर अंडमान-निकोबार के घने जंगलों तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है — विकास की क़ीमत कौन चुकाएगा, और कब तक चुकाएगा? यह लेख पिछले दो दशकों के आधिकारिक आंकड़ों, संसद में पेश रिपोर्टों, अदालती फैसलों और शोध रिपोर्टों के आधार पर इस सवाल की तह तक जाने की कोशिश करता है।

1. कितने जंगल उजड़े — बीते दो दशकों का हिसाब

भारत में वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के बाद से औद्योगिक और विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि का "डायवर्जन" (गैर-वन उपयोग) एक वैधानिक प्रक्रिया के तहत होता आया है, लेकिन इसका पैमाना चौंकाने वाला है:

क़ानून बनने के बाद के 44 वर्षों में देश भर में क़रीब 10.26 लाख हेक्टेयर वन भूमि साफ़ की जा चुकी है।

केवल पिछले 15 वर्षों (2008-09 से 2022-23) में ही 3,05,756 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन कार्यों के लिए डायवर्ट की गई — यानी औसतन हर साल क़रीब 20,000 हेक्टेयर।

संसद में पेश हालिया आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों और मौजूदा वित्त वर्ष (6 अगस्त 2026 तक) में ही 82,817.92 हेक्टेयर (लगभग 828 वर्ग किलोमीटर) वन भूमि को मंज़ूरी दी जा चुकी है — यह रक़बा लगभग एक लाख फ़ुटबॉल मैदानों के बराबर बैठता है।

राज्यवार तस्वीर में दो अलग समयावधियों के आंकड़े देखने लायक हैं। पिछले 15 वर्षों (2008-09 से 2022-23) के संचयी डायवर्जन में पंजाब सबसे ऊपर रहा (61,318 हेक्टेयर), उसके बाद मध्य प्रदेश और ओडिशा का स्थान रहा। लेकिन पिछले तीन वर्षों और मौजूदा वित्त वर्ष (6 अगस्त 2026 तक) के ताज़ा आंकड़ों में तस्वीर काफ़ी अलग है

 — इस दौर में मध्य प्रदेश सबसे ऊपर रहा (22,027.02 हेक्टेयर, यानी कुल का करीब एक-चौथाई), उसके बाद ओडिशा (10,098.99 हेक्टेयर), अरुणाचल प्रदेश (7,828.31 हेक्टेयर) और झारखंड (6,199.41 हेक्टेयर) का स्थान रहा, फिर छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश आगे की पंक्ति में हैं।

सिर्फ़ जुलाई 2026 में ही पर्यावरण मंत्रालय की अधिकार-प्राप्त समिति ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में कोयला व लौह-अयस्क खनन के लिए 1,954 हेक्टेयर से अधिक नई वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक मंज़ूरी दी।

वन आवरण के आंकड़े बनाम ज़मीनी हक़ीक़त: सरकार की भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) हर दो साल में जारी होती है और आमतौर पर वन आवरण में मामूली बढ़त दिखाती है — जैसे 2023 की रिपोर्ट में 2021 के मुक़ाबले 1,445.81 वर्ग किमी की बढ़त बताई गई। लेकिन वन शोधकर्ता इस "बढ़त" पर सवाल उठाते हैं, क्योंकि इसमें वाणिज्यिक बागान (प्लांटेशन) और सड़क किनारे के वृक्षारोपण को भी "वृक्ष आवरण" में गिन लिया जाता है, जबकि घने प्राकृतिक जंगल की गुणवत्ता में गिरावट जारी रहती है। पूर्वोत्तर भारत में यह चिंता सबसे स्पष्ट है, जहां 2009 से 2019 के बीच दस वर्षों में 3,199 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र घट चुका था। पश्चिमी घाट में भी बीते दस वर्षों में शुद्ध वन क्षेत्र में कमी दर्ज हुई है, हालांकि अति-सघन वन बढ़े और मध्यम-खुले वन घटे।

सबसे चिंताजनक चेतावनी शोधकर्ताओं की ओर से आई है: एक विश्लेषण के मुताबिक़ अगले दस वर्षों से भी कम समय में देश के 45 से 64 प्रतिशत वन क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के "हॉटस्पॉट" की चपेट में आ जाएंगे, और 2050 तक देश का पूरा जंगल ही इस असर की जद में होगा।

2. जलवायु परिवर्तन: आंकड़ों में लिखी तबाही

भारत जलवायु आपदाओं के सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है, और इसके आर्थिक व मानवीय नुक़सान अब स्पष्ट रूप से दर्ज होने लगे हैं:

जलवायु जोखिम सूचकांक (Climate Risk Index) 2025 के अनुसार, 1993 से 2022 के बीच भारत दुनिया का छठा सबसे अधिक प्रभावित देश रहा, जिसे 180 अरब डॉलर से ज़्यादा का नुक़सान झेलना पड़ा।

वैश्विक स्तर पर देखें तो 1995 से 2024 के बीच दुनिया भर में 9,700 से अधिक चरम मौसम की घटनाओं ने 8.32 लाख से ज़्यादा लोगों की जान ली और क़रीब 4.5 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुक़सान किया — इस सूची में भारत अब दुनिया के दस सबसे असुरक्षित देशों में नौवें स्थान पर दर्ज है।

सिर्फ़ 2025 में — दिल्ली स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) और डाउन टू अर्थ के विश्लेषण के अनुसार — साल के पहले 11 महीनों के 334 में से 331 दिन देश में कोई-न-कोई चरम मौसम घटना (लू, शीतलहर, आकाशीय बिजली, तूफ़ान, बादल फटना, अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन) दर्ज हुई। इनमें क़रीब 4,419 लोगों की मौत, 1.74 करोड़ हेक्टेयर फ़सल क्षेत्र प्रभावित, 1.81 लाख से अधिक घर तबाह और 77,189 पशुओं की जान गई। सामान्यतः सूखी मानी जाने वाली सर्दी में भी 2025 में 97% दिन चरम मौसम की चपेट में रहे।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक़ 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज हुआ।

आगे क्या होगा — प्रोजेक्शन:

एशिया-प्रशांत जलवायु रिपोर्ट 2024 की चेतावनी के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते भारत को 2070 तक अपनी GDP का 24.7% तक नुक़सान झेलना पड़ सकता है।

वैश्विक आपदा जोखिम आकलन रिपोर्ट 2022 के अनुसार, 2100 तक समुद्र-स्तर बढ़ने से भारत में क़रीब 2.7 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं।

खाद्य सुरक्षा पर सीधा असर: गेहूं की पैदावार में 2050 तक 19.3% और 2080 तक 40% तक गिरावट आ सकती है, जबकि ख़रीफ़ मक्का की पैदावार क्रमशः 18% और 23% तक घट सकती है।

3. वन्यजीव — कौन बचा, कौन जा रहा है

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार अब तक विश्व भर में 1,63,000 प्रजातियों का आकलन हो चुका है, जिनमें से लगभग 28% विलुप्ति के ख़तरे में हैं। इसी संदर्भ में भारत ने अक्टूबर 2025 में IUCN वर्ल्ड कंज़र्वेशन कांग्रेस में अपना राष्ट्रीय रेड लिस्ट रोडमैप 2025-2030 लॉन्च किया।

भारत में दर्ज प्रजातियों की संख्या भी बड़ी है — 1,04,000 से अधिक प्राणी प्रजातियां, 18,000 से अधिक पुष्पीय पौधे और 20,000 से अधिक समुद्री प्रजातियां।

प्रवासी वन्यजीवों पर वैश्विक स्तर की तस्वीर चिंताजनक है: 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड माइग्रेटरी स्पीशीज़' रिपोर्ट के हालिया अंतरिम आंकड़ों के अनुसार, संरक्षित 49% प्रवासी वन्यजीव आबादी में गिरावट दर्ज हो रही है और वैश्विक स्तर पर 24% प्रजातियां विलुप्ति के ख़तरे का सामना कर रही हैं — भारत के तटीय इलाक़ों सहित प्रमुख प्रवासी मार्गों पर यह गिरावट साफ़ दिखती है।

4. कुछ सफलता की कहानियां भी:

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में बाघों की संख्या 2018 के 2,967 से बढ़कर 2022 में 3,682 हो गई — भारत ने बाघों की संख्या दोगुनी करने का TX2 लक्ष्य तय समय से चार साल पहले ही हासिल कर लिया।

हाथियों की संख्या भी इसी अवधि में 26,786 से बढ़कर 29,964 हुई।

देश में फ़िलहाल 1,014 संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क है (106 राष्ट्रीय उद्यान, 573 वन्यजीव अभयारण्य, 115 संरक्षण रिज़र्व, 220 सामुदायिक रिज़र्व), जो कुल भौगोलिक क्षेत्र के 5.32% हिस्से को कवर करता है।

यानी जहां "फ़्लैगशिप" प्रजातियों (बाघ, हाथी) पर केंद्रित सुरक्षा योजनाओं के नतीजे उत्साहजनक हैं, वहीं व्यापक जैव विविधता और प्रवासी प्रजातियों की तस्वीर उतनी भरोसेमंद नहीं है।

केस स्टडी 1 — हसदेव अरण्य: विधानसभा कहती कुछ, ज़मीन पर होता कुछ और

छत्तीसगढ़ के कोरबा और सरगुजा ज़िलों में फैला 1,878 वर्ग किलोमीटर का हसदेव अरण्य पिछले एक दशक से कोयला खनन बनाम आदिवासी अधिकारों की लड़ाई का केंद्र बना हुआ है।

परसा ईस्ट और कांता बसन (PEKB) कोयला खदान परियोजना — जो अडाणी समूह द्वारा संचालित है और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित है — के लिए 137 हेक्टेयर जंगल में हज़ारों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं, और आशंका है कि आने वाले समय में 2.5 लाख से अधिक पेड़ काटे जा सकते हैं।

मई 2022 के अध्ययनों में चेतावनी दी गई थी कि जंगल साफ़ होने से हाथियों का आवास नष्ट होगा और मानव-हाथी संघर्ष और बढ़ेगा।

जुलाई 2022 में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से हसदेव क्षेत्र की सभी कोयला खदानों की अनुमतियां रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया।

राज्य सरकार ने ख़ुद जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर कहा कि यहां किसी नई कोयला खदान की ज़रूरत नहीं है।

इसके बावजूद पेड़ों की कटाई जारी रही, और नागरिक समाज संगठनों की शिकायत पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 15,000 से अधिक पेड़ों की अवैध कटाई की जांच के लिए सात-सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया।

स्थानीय आदिवासी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़पें भी हुई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी मोर्चा खोला और सत्तारूढ़ दल पर आदिवासी हितों की क़ीमत पर कॉरपोरेट फ़ायदे का आरोप लगाया।

इस पूरे मामले में एक दिलचस्प — और चिंताजनक — पैटर्न सामने आया है: जो भी दल सत्ता में होता है, वह खदान खोलने के पक्ष में खड़ा दिखता है, और विपक्ष में आते ही वही दल इसका विरोधी बन जाता है। यानी हसदेव अरण्य का भविष्य दलगत राजनीति की भेंट चढ़ता दिख रहा है, ठोस समाधान अब भी दूर है।

केस स्टडी 2 — ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास बनाम आख़िरी बचे जंगल

अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप पर क़रीब 92,000 करोड़ रुपये की मेगा परियोजना प्रस्तावित है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफ़ील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट शामिल हैं।

पर्यावरणीय चिंताएं:

परियोजना के लिए क़रीब 9.6 लाख पेड़ों की कटाई होनी है, जिससे क्षेत्र की कार्बन-सोखने की क्षमता पर सीधा असर पड़ेगा।

अनुमान है कि क़रीब 130 वर्ग किलोमीटर जंगल ख़त्म हो सकता है।

परियोजना स्थल गैलाथिया बे और कैंपबेल बे राष्ट्रीय उद्यानों के 10 किलोमीटर के दायरे में आता है, और इसके कुछ हिस्से समुद्री कछुओं के घोंसले वाले तटों, मैंग्रोव और मूंगा-चट्टान क्षेत्रों (CRZ 1A) से जुड़े बताए जाते हैं, जहां निर्माण पर आमतौर पर रोक होती है।

सबसे बड़ी चिंता शोम्पेन जनजाति को लेकर है — यह एक विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) है, जिसकी आबादी 300 से भी कम है और जो जंगल के भीतर पारंपरिक शिकार-संग्रह जीवनशैली जीती है। केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने ख़ुद अंडमान-निकोबार प्रशासन से रिपोर्ट मांगी कि क्या वन भूमि के इस्तेमाल से पहले वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत जनजातियों के अधिकारों का निपटारा किया गया था या नहीं।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री को पत्र लिखकर परियोजना पर तत्काल रोक और संसदीय समितियों से समीक्षा की मांग की।

सरकार और समर्थकों का तर्क:

रणनीतिक रूप से निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के नज़दीक है, जहां भारत की एकमात्र त्रि-सेवा कमान (अंडमान एवं निकोबार कमान) मौजूद है — परियोजना इसे एक अधिक सक्षम अग्रवर्ती सैन्य मंच में बदल सकती है और कोलंबो-सिंगापुर पर निर्भरता घटाकर "ब्लू इकॉनमी" व एक्ट ईस्ट नीति को मज़बूती दे सकती है।

समर्थक यह भी बताते हैं कि द्वीपों पर विकास योजनाएं पहले की सरकारों के दौर में भी प्रस्तावित रही हैं, इसलिए मौजूदा विरोध को लेकर सवाल उठाते हैं।

फ़िलहाल परियोजना पर NGT समिति की निगरानी और संसदीय स्थायी समिति की सुनवाई जारी है, लेकिन विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा।

क़ानून की लड़ाई: वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023

2023 में केंद्र सरकार ने वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 में संशोधन कर उसका दायरा बदल दिया।

पर्यावरणविदों और वन अधिकार कार्यकर्ताओं की मुख्य आपत्ति यह रही कि संशोधन वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों को मिले संरक्षण को कमज़ोर करता है और वन भूमि के इस्तेमाल की शक्तियों का केंद्रीकरण करता है।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने संसद में इस पर आपत्ति जताई कि विधेयक को संबंधित स्थायी समिति की बजाय एक चुनी हुई संयुक्त समिति के पास भेजा गया।

मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए उन राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों पर भी सवाल उठाए जो वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम 2023 को ठीक से लागू करने में विफल रहे। कांग्रेस ने इसे केंद्र सरकार द्वारा पारिस्थितिक संरक्षण संस्थाओं व नियामक व्यवस्था को कमज़ोर करने की कोशिश बताते हुए इस अदालती आदेश का स्वागत किया।

यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जहां वन अधिकार व राज्य की संप्रभुता से जुड़े प्रावधानों के बीच के अंतर्विरोध पर विचार चल रहा है।

सरकार का आधिकारिक रुख़

सरकार के जवाब को दो स्तरों पर देखा जा सकता है — बयानबाज़ी और बजट आवंटन:

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव बार-बार यह रेखांकित करते रहे हैं कि वन संरक्षण का मतलब सिर्फ़ पेड़ लगाना नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा है, और इसके लिए ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम व कार्बन क्रेडिट जैसे बाज़ार-आधारित औज़ारों पर ज़ोर दिया जा रहा है।

2025-26 के बजट में वन्यजीव आवासों के एकीकृत विकास के लिए 450 करोड़ रुपये और प्रोजेक्ट टाइगर व प्रोजेक्ट एलिफेंट के लिए 290 करोड़ रुपये (कुल आवंटन का 64%, जो 2024-25 के मुक़ाबले 18% अधिक है) रखे गए हैं।

कैम्पा (प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन प्राधिकरण) की हालिया बैठक में चार बड़ी संरक्षण परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत ने COP30 (बेलेम, ब्राज़ील) में उष्णकटिबंधीय वनों के संरक्षण के लिए सैटेलाइट-आधारित भुगतान मॉडल वाली वैश्विक पहल का हिस्सा बनने की दिशा में क़दम बढ़ाए, और ब्रिक्स देशों की पर्यावरण मंत्री-स्तरीय बैठक की मेज़बानी करते हुए साझा तकनीकी सहयोग पर ज़ोर दिया।

विरोधाभास: एक तरफ़ सरकार वन्यजीव संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय जलवायु मंचों पर मज़बूत प्रतिबद्धता दिखाती है, दूसरी तरफ़ उसी अवधि में हसदेव और ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं के लिए वन भूमि की मंज़ूरियां भी लगातार जारी रहती हैं — यही विरोधाभास आलोचना का मुख्य आधार बना हुआ है।

विपक्ष और सिविल सोसाइटी का पक्ष

कांग्रेस लगातार वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2023 को "बेहद कठोर" और "मनमाने ढंग से पारित" क़ानून बताती रही है, और सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2025 के आदेश को केंद्र सरकार के लिए "कड़ी फटकार" के रूप में पेश करती है।

हसदेव और ग्रेट निकोबार, दोनों ही मामलों में कांग्रेस के जयराम रमेश परियोजनाओं की समीक्षा और रोक की मांग करते रहे हैं।

पर्यावरणविद और आदिवासी अधिकार संगठन शिकायत करते हैं कि संरक्षण के नाम पर बनी नई व्यवस्थाएं वास्तव में उन्हीं स्थानीय समुदायों को दरकिनार करती हैं, जो परंपरागत रूप से वनों के सबसे बड़े संरक्षक रहे हैं।

NGT जैसी संस्थाएं बार-बार जांच समितियां गठित कर रही हैं, जो बताता है कि नियामक ढांचा सक्रिय तो है, लेकिन घटनाओं के घट जाने के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित है।

आगे क्या होगा — डेटा क्या संकेत देता है

मौजूद आंकड़ों और शोध अनुमानों को जोड़कर देखें तो तस्वीर इस तरह बनती है:

जलवायु परिवर्तन हॉटस्पॉट में आने वाला वन क्षेत्र — मौजूदा स्थिति: 45-64% (अनुमान); भविष्य का अनुमान: 2050 तक लगभग 100%।

भारत की GDP पर जलवायु असर — भविष्य का अनुमान: 2070 तक 24.7% तक नुक़सान।

समुद्र-स्तर वृद्धि से प्रभावित आबादी — भविष्य का अनुमान: 2100 तक लगभग 2.7 करोड़ लोग।

गेहूं की पैदावार में गिरावट — भविष्य का अनुमान: 2050 तक 19.3%, 2080 तक 40%।

IUCN-आकलित प्रजातियों में विलुप्ति जोखिम — मौजूदा स्थिति: 28%; भविष्य का अनुमान: बढ़ने की आशंका, विशेषकर आवास हानि जारी रहने पर।

वन भूमि डायवर्जन की गति (हालिया) — मौजूदा स्थिति: ~3 वर्षों में 82,818 हेक्टेयर; भविष्य का अनुमान: नीतिगत बदलाव के बिना जारी रहने का अनुमान।

यानी संख्याएं साफ़ इशारा करती हैं कि अगर मौजूदा रफ़्तार से वन भूमि का डायवर्जन जारी रहा और जलवायु-अनुकूल नीतियां समय पर लागू नहीं हुईं, तो अगले तीन दशकों में भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर क़ीमत चुकानी पड़ सकती है — कृषि उत्पादकता में गिरावट, जैव विविधता का क्षरण, और चरम मौसम की घटनाओं से बढ़ता जान-माल का नुक़सान।

निष्कर्ष: बचेगा क्या, कितना बचेगा?

भारत की कहानी काली-सफ़ेद नहीं है। बाघ और हाथियों जैसी "फ़्लैगशिप" प्रजातियों की सुरक्षा में मिली कामयाबी दिखाती है कि लक्ष्य-आधारित, संसाधन-संपन्न संरक्षण योजनाएं नतीजे दे सकती हैं। लेकिन हसदेव अरण्य और ग्रेट निकोबार जैसे मामले यह भी दिखाते हैं कि जब बड़े आर्थिक या रणनीतिक हित सामने आते हैं, तो विधानसभा के प्रस्ताव, सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफ़नामे और NGT की जांच समितियां भी ज़मीन पर पेड़ कटने से नहीं रोक पातीं।

असली सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं — सवाल यह है कि क्या भारत के पास ऐसा कोई तंत्र है जो यह तय कर सके कि कौन-सा विकास किस क़ीमत पर उचित है, और वह क़ीमत कौन चुकाएगा — आज की पीढ़ी, आने वाली पीढ़ियां, स्थानीय आदिवासी समुदाय, या फिर वे लाखों प्रजातियां जिनकी अपनी कोई आवाज़ नहीं है। जब तक यह तंत्र राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनता, तब तक "विकास की दौड़ में पर्यावरण की बलि कब तक" — यह सवाल हर नई परियोजना के साथ दोहराया जाता रहेगा।

संदर्भ (References)

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India Daily — क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, 92,000 करोड़ की योजना — theindiadaily.com

Vision IAS — ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना — visionias.in

आजतक — जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार परियोजना पर रोक की मांग की — aajtak.in

Anantam IAS — ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना: सामरिक और पर्यावरणीय बहस — anantamias.com

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प्रभात ख़बर — वन भूमि के गैर वन संबंधी इस्तेमाल में झारखंड छठे स्थान पर — prabhatkhabar.com

The Wire हिंदी — केंद्र सरकार ने खनन के लिए वन भूमि डायवर्जन को मंज़ूरी दी — thewirehindi.com

SabrangIndia (हिंदी) — 44 साल में देश में 10.26 लाख हेक्टेयर जंगल साफ़ — hindi.sabrangindia.in

Johar LIVE — संसद में पेश आंकड़े, तीन साल में वन भूमि डायवर्जन का राज्यवार विवरण — joharlive.com

डाउन टू अर्थ (हिंदी) — वन (संरक्षण) संशोधन कानून 2023: वरदान या अभिशाप — hindi.downtoearth.org.in

डाउन टू अर्थ (हिंदी) — किसके फ़ायदे के लिए हो रहा है वन संरक्षण कानून में बदलाव — hindi.downtoearth.org.in

CJP — प्रस्तावित वन संरक्षण विधेयक 2023 ने बढ़ाई चिंता — cjp.org.in

नवजीवन इंडिया — वन अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश मोदी सरकार के लिए फटकार — navjivanindia.com

प्रतिदिन राजधानी — वन संरक्षण सिर्फ़ पेड़ लगाना नहीं: भूपेंद्र यादव — pratidinrajdhani.in

हलधर किसान — कैम्पा ने 4 बड़ी संरक्षण परियोजनाओं को मंज़ूरी दी — haldharkisan.in

नोट: इस लेख में उद्धृत सभी आंकड़े संबंधित सरकारी रिपोर्टों (ISFR, पर्यावरण मंत्रालय, संसदीय जवाब), अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (IUCN, Germanwatch) और स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं, जिनके स्रोत ऊपर सूचीबद्ध हैं। राज्यवार वन भूमि डायवर्जन के आंकड़े दो अलग समयावधियों (15-वर्षीय संचयी बनाम हालिया 3-वर्षीय) से हैं, जिन्हें ऊपर स्पष्ट रूप से अलग-अलग दर्शाया गया है। शेष आंकड़े प्रकाशन-पूर्व मूल स्रोतों से एक बार और पुष्ट कर लेने की सलाह दी जाती है।

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